सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

मूलभूत इच्छा का वैकल्पिक विमर्श

एक आदर्श शासन प्रणाली की चाहत हमेशा से मानवीय चिंतन और गतिविधियों के
केंद्र में रही है। यह एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक इच्छा है। महाभारत के
शांतिपर्व में 'स्थितप्रज्ञ राजाÓ की खोज हो अथवा प्लेटो द्वारा 'फिलॉसफर
किंगÓ का खोजा जाना, इन सबके केंद्र में आदर्श शासक और शासन प्रणाली ही
है।
'शासक केंद्रितÓ विचारों से लंबी दूरी तय करते हुए अब हम 'संस्था
केंद्रितÓ, 'व्यवस्था केंद्रितÓ शासन प्रणालियों के दौर में जी रहे हैं।
इन प्रणालियों में लोकतंत्र सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। अपने देश
भारत में आजादी के बाद लोकतंत्र का 'वेस्टमिंस्टर संस्करणÓ अपनाया गया,
लेकिन अपनाने के 65 वर्षों बाद भी यह प्रणाली निर्धारित अपेक्षाओं को
पूरा करने में बुरी तरह विफल साबित हुई है। इसके कारण देश में हर स्तर पर
एक व्यग्रता देखने को मिलती है। भानू धमीजा की पुस्तक 'व्हाई इंडिया
नीड्ज प्रेजिडेंशियल सिस्टमÓ इसी व्यग्रता की सकारात्मक और समाधानपरक
अभिव्यक्ति है।
मीडिया और प्रकाशन जगत से संबद्ध होने के कारण लेखक भानू धमीजा का
व्यवस्थागत विकृतियों से सीधा वास्ता पड़ा है। लेेखक ने इन विकृतियों को
एक सच्चे भारतीय की तरह महसूस किया है और यह भारतीयता की छटपटाहट
वैकल्पिक व्यवस्था तलाशने के श्रमसाध्य रास्ते पर धकेलती है। पुस्तक की
भूमिका में ही लेखक ने 'इंडिया इज माई ओनली कॉजÓ लिखकर अपनी मूल चिंता को
बहुत स्पष्ट तरीके से व्यक्त कर दिया है।
पुस्तक में बहुत शोधपूर्ण तरीके से इस बात को स्थापित किया गया है कि
सत्ता के अतिशय सकेंद्रीकरण के कारण भारतीय शासन प्रणाली गंभीर खतरों का
सामना कर रही है। नेहरू के लगाव के कारण किस तरह संसदीय शासन प्रणाली
स्वीकार की गई और उनके प्रभाव ने किस तरह इसकी दिशा-दशा तय की, इसका बहुत
रोचक लेखा-जोखा इस पुस्तक में मिलता है। प्रसिद्ध संविधानविद् सुभाष
कश्यप के एक कथन को उद्घृत कर लेखक ने बहुत चुटीले तरीके से वर्तमान शासन
प्रणाली पर व्यंग्य किया है। सुभाष कश्यप के अनुसार 'यदि जवाहर लाल
नेहरू भारत के प्रथम राष्ट्रपति होते और राजेंद्र प्रसाद देश के पहले
प्रधानमंत्री होते तो आज देश का राजनीतिक तंत्र, संसदीय से अधिक
राष्ट्रपति प्रणाली की तरफ झुका हुआ होता और इसके लिए मौजूदा संविधान में
किसी बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती।Ó यह कथन बताता है कि भारतीय शासन
प्रणाली कितनी व्यक्ति केंद्रित है।
इतिहास के पुराने पन्नों और वर्तमान के पड़ावों की यात्रा के बाद लेखक इस
निष्कर्ष पर पहुंंचा है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र के मूल में ही
गड़बड़ी है। इसलिए, सुधार के जरिए इसे सही रास्ते पर लाने के कोशिशों का
असफल होना तय है। ऐसे में भारत को अन्य शासन प्रणालियों को जांचने की
दिशा में आगे बढऩा चाहिए। भानू को लगता है कि अमरीका की राष्ट्रपति
प्रणाली भारत के लिए सबसे अधिक मुफीद है। उन्होंने राष्ट्रपति प्रणाली के
कई तथ्यों को रेखांकित करके अपनी बात को पुष्ट किया है। पहला तथ्य यह है
कि संघात्मक संप्रभुता के कारण राष्ट्रीयता और स्थानीयता दोनों की
भावनाएं संतुष्ट होती हैं और इसके कारण शासन-प्रशासन को पहचान के
प्रश्रों को सुलझाने के लिए बहुत श्रम नहीं करना पड़ता। इसी तरह न्यायिक
पुनरावलोकन व्यक्ति के बजाय संस्थान और कानून को सर्वाेपरि नियंत्रक के
रूप में स्थापित करता है। राष्ट्रपति प्रणाली में सरकारों का कार्यकाल
स्थिर होता है। इसके कारण राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय आत्मबल का विकास
होता है। इसके उलट संसदीय शासन प्रणाली में जोड़-तोड़ की राजनीति के कारण
सरकारें बनती-बिगड़ती रहती हैं, जिसके कारण असुरक्षा की भावना पनपती है
और दूरगामी लक्ष्य तय नहीं हो पाते। इसी तरह कानूनों का कम हस्तक्षेप भी
व्यक्ति में पहल करने की भावना भरता है।
निश्चित रूप से अमरीका में राष्ट्रपति प्रणाली काफी सफल रही है।
शासन-प्रशासन के कई अच्छे उदाहरण वहां से आए हैं। इस प्रणाली को अपनाना
एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। लेखक ने पूरे विमर्श को खुला और
अकादमिक रखा है। इसीलिए, पुस्तक की भूमिका में वह अपने विचारों को ज्यों
का त्यों स्वीकार करने के बजाय अमरीकी संविधान निर्माताओं की तीक्ष्ण
बुद्धि पर विश्वास रखने को कहता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि किताब
का जोर किसी निष्कर्ष को थोपने की बजाय एक वैकल्पिक विमर्श को खड़ा करने
पर है।
इस किताब में कई मूलभूत प्रश्रों का उत्तर मिलना शेष रह जाता है। मसलन,
क्या पूरी की पूरी व्यवस्था को आयात करना एक फलदायी प्रक्रिया साबित
होगी। इतिहास इसके बारे में हमें सजग रहने और चयनित दृष्टिकोण अपनाने का
सबक देता है। इसके बावजूद, भारत के उज्ज्वल भविष्य के आकांक्षी प्रत्येक
नागरिक, अकादमिक जगत, पत्रकार बिरादरी तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए
यह पुस्तक वैकल्पिक व्यवस्था के विमर्श  हेतु एक प्रस्थान बिंदु की तरह
है। विमर्श का फलक विस्तृत बनाने के लिए पुस्तक का हिंदी संस्करण सहयोगी
साबित होगा।
पुस्तक : व्हाई इंडिया नीड्स दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम
प्रकाशक : हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्ज, इंडिया
कुल पृष्ठ : 373
दाम : 550 रुपए (पेपर बैक)

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