रविवार, 15 मई 2016

शक्ति पूजा का ‘निराला’ पथ


नवरात्र शक्ति के आह्वान का पर्व है। यह शक्ति के अवतरण के लिए आधारभूमि तैयार करने का साधना काल है, इसलिए इसे साधनापर्व भी कहा जाता है। शाक्त सपं्रदाय की मान्यता है कि दैवीय शक्ति विविध, सूक्ष्म रुपों में सदैव ब्रह्मांड में विचरती रहती है लेकिन वह प्रत्यक्ष और भौतिक रुप तभी धारण करती है, जब उसको उचित आधार मिलता है। उसका अवतरण उचित पात्र में संभव हो पाता है। आधार पुष्ट हो, शक्ति के तेज को वहन करने योग्य हो, तो शक्ति का अवतरण स्वयं घटित हो जाता है। इसलिए, नवरात्रों में स्वयं को साधने की कोशिश की जाती है, स्वयं को एक मजबूत आधार, उचित पात्र में रुपांतरित करने की कोशिश होती है।
व्रत, उपवास, जप, अखंड दीप, संयमित जीवनशैली शक्ति के तेज को धारण करने की तैयारी ही तो हैं। नौ दिनों तक ब्रह्मांडीय शक्तियों का आह्वान और पिंडीय (शरीरगत) शक्तियों का स्मरण यही तो नवरात्र है। यहां पर यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि शक्ति का साधना का मतलब अप्राप्य शक्तियों की प्राप्ति भर नहीं है बल्कि यह प्राप्त शक्तियों के सतत स्मरण और उन पर विश्वास बनाए रखने की भी साधना है। ‘अहं ब्रह्मास्मि‘ के स्वरुप को सतत याद रखने मात्र से हम विराट शक्तिपुंज से जुड़ जाते हैं। इस स्वरुप के स्मरण मात्र से हमारा कर्मक्षेत्र और लक्ष्य दोनांे विस्तृत हो जाते हैं। इसी तरह ‘का चुप साधि रहा बलवाना‘ के जरिए भी जांबवान ने हनुमान को उनके ‘अतुलित बलधामं‘ के स्वरुप से परिचित कराने की कोशिश भर की है। उसके बाद शक्ति का विस्फोट कैसे होता है और वह कौन-कौन अविश्वसनीय काम करा लेती है, यह बताने की जरुरत नहीं है।
यहां पर प्रश्न यह उठता है कि क्या शक्ति जागरण अथवा शक्ति अवतरण केवल वाह्य उपकरणों तक सीमित है। क्या वाह्य पदार्थों के अर्पण तक ही शक्ति साधना सीमित है और क्या अंतःकरणीय रुपांतरण, शक्ति का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आवश्यक नहीं है? शक्ति जागरण में वाह्य विधि-विधान और अंतःकरणीय रुपांतरण संबंधों को लेकर भारतीय मनीषियों में चिंतन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है, लेकिन इस पर बहुत मौलिक और सामयिक चिंतन हमें निराला की कविता राम की शक्तिपूजा में मिलता है। आज जब शक्तिपूजा को लेकर विभ्रम की स्थिति पैदा हो गई है अथवा की जा रही है, तो निराला की शक्तिपूजा हमें शक्ति और उसकी पूजा के सत्व से परिचित करा सकती है।
स्थूल दृष्टि से देखें तो यह कविता राम-रावण युद्ध के दौरान विजय प्राप्त विजय प्राप्त करने के लिए भगवान राम द्वारा की गई शक्ति उपासना का एक विशद, काव्यमय वर्णन मात्र है। लेकिन यदि गहराई में उतरें तो यह पाते हैं कि इस कविता शक्ति की गरिमा का बखान तो है ही , उसके साथ ही शक्ति साधना का सूक्ष्म और तात्विक विवेचन भी है, जिसके जरिए शक्ति-अवतरण के वास्तविक सूत्रों की पहचान की जा सकती है।
यह महाकविता शक्ति की प्रकृति, गति और महत्ता को बहुत सूक्ष्मता से संबोधित करती है। शक्ति की सबसे अधिक आवश्यकता संक्रमणकाल में होती है। परिवर्तन के समय, यु़द्ध के समय, प्रत्येक व्यक्ति शक्ति का आकांक्षी हो जाता है। संक्रमण और परिवर्तन के दौर में जिसके पास शक्ति का बाहुल्य होता है वह मूल्यों को नई व्यवस्था को अपने ढंग से गढ़ता है। संभवतः यही कारण है कि शक्ति आराधना का पर्व ऐसे समय पर पड़ता है जब समय करवट ले रहा होता है। संक्रमणों से आदमी त्र्ास्त होता है। ऐसे में शक्ति साधना का आध्यात्मिक महत्व तो होता ही है, उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी महत्व कम नहीं होता।  
‘ राम की शक्ति पूजा ’ भी राम-रावण युद्व के एक बिंदु से प्रारंभ होती है, जहां पर युद्ध निर्णायक स्थिति में पहुंच चुका होता है। उस दिन विशेष का युद्ध थोड़ा रावण के पक्ष में झुका हुआ होता है। राम व्यथित और हताश है। कविता स्थिति का जीवंत वर्णन करते हुए कहती है-
लौटे-युग-दल-राक्षस -पतदल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरण चिन्ह,चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।
प्रशमित है वातावरण , नमित मुख सांध्यकमल,लक्ष्मण चिंतापल पीछे वानर वीर-सकल।
स्थितियां बहुत निराशाभरी हैं। विश्वविजय की क्षमता रखने वाले भगवान राम अपनी क्षमताओं को बिसरा चुके हैं। पहली बार उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि युद्ध हाथ से निकल चुका है। इस मनःस्थिति और परिस्थिति का वर्णन कवि बहुत सजीव ढंग से करता है-
है अमानिशा, उगलता गगन घन अंधकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण जय-भय।
कारण बहुत स्पष्ट था। राम आज युद्ध भूमि में हतलक्ष्य हो गए थे। विश्वविजय की क्षमता रखने वाले और क्षात्रधर्म की प्रतिष्ठा रखने वाले उनके तमाम शस्त्र विफल हो गए थे। रावण को लक्ष्य करके वह जिस भी शक्ति का संधान कर रहे थे, वह निष्फल हो जा रही थी। महाशक्ति ने आज रावण को अपने आंचल की छांव दे रखी थी और वह राम के युद्ध विजय के प्रयासों से क्रोधित हो रही थी। शक्ति के इस रुप को देखकर, उसे रावण के पक्ष में देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम स्वयं को हतबल पा रहे थे- 
देखा है महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक
हत मंत्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार, निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र बार-बार
विचलित लख कपिदल क्रुद्ध,युद्ध को मै ज्यो-ज्योंझक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यो-त्यों
पश्चात, देखने लगी बंध गए हस्त, फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बंधा मैं, हुआ त्रस्त।
शक्ति को अन्याय के पक्ष देखकर श्री राम को घोर आश्चर्य हुआ। वह शिकायत भरे शब्दों में कहते हैं-‘ अन्याय जिधर, है उधर शक्ति ’। मर्यादा पुरुषोत्तम की यह क्षोभ हर धार्मिक व्यक्ति का क्षोभ है। हम भी जब देखते हैं कि अन्याय के पक्ष में संसाधन हैं, शक्ति है, ऐश्वर्य है, पद -प्रतिष्ठा है तो हमारी मनोव्यथा भी रघुवर जैसी ही होती है। अन्याय के पक्ष में शक्ति होने की विडंबन हम सब को व्यथित करती है। कई बार इसे नियति भी मान लिया जाता है। ऐसी स्थिति में हम यह भूल जाते हैं कि शक्ति भी कुछ नियमों से संचालित होती है। ऐसे पड़ावों पर शक्ति की प्रकृति और उसकी गति को दरकिनार कर दिया जात़ा है। महाप्राण निराला जाम्बवान के माध्यम से शक्ति की उसी प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं-
हे पुरुष सिंह, तुम भी शक्ति को करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर
तुम बरो विजय संयत प्राणों को प्राणों पर, रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय ही सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन
छोड़ दो समर जब तक न सिद्ध हो, रघुनंदन!
जाम्बवान का यह कथन शक्ति को संचालित करने वाले कई सिद्धांतों का अनावरण करती है। पहला यह कि शक्ति का अर्जन प्रयासों के तत्र से जुड़ा है। जो भी प्रयास करता है, शक्ति के द्वार पर प्रयासों के माध्यम से दस्तक देता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता। रावण खल है लेकिन पुरुषार्थी भी है, इसलिए शक्ति उसके पक्ष में खड़ी हुई दिखाई पड़ती है। जब हम अच्छे-बुरे का विभाजन कर, शक्ति को बुराई के पक्ष में खड़ा करने की धृष्टता कर रहे होते हैं तो पुरुषार्थ की महिमा और प्रक्रिया के महत्व को भी नकार रहे होते हैं। 
हो सकता है और प्रायः होता ही है कि खल पक्ष सापेक्षिक दृष्टि से अधिक पुरुषार्थी होता है, ज्यादा प्रयत्नशील होता है और शक्ति अर्जन की प्रक्रियाओं के बारे में अधिक सजग भी होता है। दूसरी तरफ सद्पक्ष पुरुषार्थ के जरिए शक्ति को प्राप्त करने, घटित हो रही घटनाओं के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और हस्तक्षेप करने की बजाय, बाहर खड़ा अच्छाई के लिए रुदन कर रहा होता है जिसकी अंतिम परिणति एक ऐसे दृष्टिकोण के रुप में आकार लेती है जो मानता है कि शक्ति असत्य के पक्ष में ही खड़ा होता है। लेकिन पुरुषोत्तम तो परम पुरुषार्थी हैं, मूर्तिमान धर्म हैं। इसलिए जांबवान उनको समझाते हुए कहते हैं कि आप तो शक्ति धारण करने के स्वाभाविक अधिकारी हैं। जांबवान यहां पर इसी तथ्य की ओर संकेत कर रहे हैं कि कुछ नियमों से संचालित होने के कारण शक्ति ऐसे किसी भी व्यक्ति पर अनुग्रह करती है जो उन नियमों के अनुसार उनकी उपासना कर रहा होता है। लेकिन शक्ति का प्रियपक्ष तो सद्पक्ष ही होता है। शक्ति के मंगलकारी आयाम की अभिव्यक्ति और दीर्घकालीन उपस्थिति तो धर्मपक्ष में ही होती है।
यहां पर जांबवान के माध्यम से निराला यह भी संकेत कर रहे हैं कि शक्ति का मौलिकता से बहुत गहरा संबंध होता है। मौलिकता एक कष्टकर प्रक्रिया है। यह खुद को सदैव सत्य की खराद पर चढ़ाए रखने से ही पैदा होती है। मौलिकता वस्तुतः स्वयं को सत्य के वृहदतर और सामयिक आयामों से जोड़ने से पैदा होती है। जब तक स्वयं के सत्य को ब्रह्मांड के सत्य से नहीं जोड़ा जाता, तब तक ब्रह्मांडीय शक्ति हममें अवतरित नहीं होती। चूंकि हर व्यक्ति और उसकी स्थितियां अद्वितीय होती हैं, इसलिए मौलिकता स्वयं को सत्य से जोड़ने की मूलशर्त बन जाती है। इसलिए जांबवान मौलिक तरीके से शक्ति की आराधना की बात कर रहे हैं।
एक और रोचक तथ्य यह है कि जांबवान राम को एक ऐेसे समय युद्ध छोड़ने की सलाह दे रहे हैं , जब युद्ध निहायत ही निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। रघुवर के बिना सेना संचालन और युद्ध में जीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन राम इस सुझाव को स्वीकार कर लेते हैं और यही असंदिग्ध निष्ठा ही उन्हें शक्ति के समीप ले जाती है।
अब मर्यादा पुरुषोत्तम शक्तिपूजा को उद्यत होते हैं। सिंह को देवी का प्रतीक मानकर ‘सिंहभाव‘ से देवी की उपासना का निर्णय करते हैं।
जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्जित, यह मेरा परम प्रतीक मातः समझा इंगित,
मैं सिंह, इसी भाव से करूंगा अभिनिंदित।
शक्ति का सिंहभाव से संबंध समझने जैसा है। शक्ति सिंहारुढ़ है। सिंह की सवारी करती है और सिंहभाव मंे निवास करती है। शेर की सवारी बहुत ही दुष्कर और खतरे से भरा कार्य है। जो शेर की सवारी करने जैसा दुष्कर कार्य कर सकते हैं, असंभव माने जाने वाले लक्ष्यों के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है, वही सिंह पर सवारी कर सकता है। शेर पराक्रमी है, चतुर है, फुर्तीला है, जो इन गुणों से युक्त है, माता उस पर सवारी करती हैं। पराक्रम भाव के बिना शक्ति का आशीर्वाद नहीं मिलता। यदि व्यक्ति में सिंहभाव है, वह शत्रु को क्षत-विक्षत करने में हिचकता नहीं, आज के शब्दों में उसके भीतर किलिंग इंस्टिंक्ट है, कालज्ञ है, उचित समय पर वार करता है, तो माता उस व्यक्ति पर सवारी करती हैं उसके भीतर अवतरित होती हैं।
इसके बाद श्रीराम प्रकृति के अंग-उपांगों में देवी की उपस्थिति की अनुभूति करते हैं। उनके लिए समुद्र से लेकर अंबर तक सब कुछ शक्ति का स्वरुप हो जाता है। वह देवी जप के पुरश्चरण के लिए 108 कमल पुष्पों की मांग करते हैं। उनके लिए कमल के पुष्प प्रकृति में उपलब्ध अर्पण करने योग्य सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। राम कहते हैं-
देखो बंधुवर, सामने,स्थिर जो वह भूधर, शोभित शत -हरित गुल्म-तृण से श्यामल सुंदर,
पार्वती कल्पना है, इसकी मकरंद विंदु , गरजता चरण प्रांत पर हिस वह, नहीं सिंधु।
दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर, अंबर में हुए दिगंबर अर्चित शशि-शेखर
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चहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इंदीवर ,कम से कम, अधिक और हों, अधिक और सुंदर 
जओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर, तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।
साधना प्रतिदिन गहन होती जाती है। श्रीराम की कुंडलिनी शक्ति जागृत होना प्रारंभ होती है। उनके आराधना के प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि कंपायमान हो जाती है।  लेकिन ज्यों ही शक्ति सहस्रार चक्र को बेधने वाली होती है, और श्रीराम 108 वां कमलपुष्प देवी को अर्पित कर आराधना का समापन करने का उ़द्यत होते हैं, देवी उनकी परीक्षा लेने के लिए, उनके पीछे रखे 108 वें पुष्प को हंसकर उठा ले जाती हैं। श्रीराम नीलकमल का अंतिम पुष्प अर्पित करने के लिए हाथ बढ़ाते हैं और वहां पर कुछ न पाकर साधना में स्थिर हो चुका उनका मन यकायक चलायमान हो उठता है। आशंकाएं उनको घेरने लगती हैं। वह अपने जीवन का घिक्कारते हैं -धिक धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध। लेकिन राम तो मर्यादा के लिए सतत संघर्ष के प्रतीक हैं। वह तुरंत ही स्वयं को संभालते हैं और 108 वें नीलकमल की जगह अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करने का निर्णय लेते हैं। इस निश्चय के साथ ही उनकी शक्ति आराधना अपने शीर्षतम बिंदु को स्पर्ष करती है और उनके व्यक्तित्व को उज्जवलतम पक्ष भी हमारे सामने आता है-
‘यह है उपाय’ कह उठे राम ज्यों मंद्रित घन,क्हती थीं, माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल है शेष अभी , यह पुरश्चरण, पूरा करता हूं देकर मातः एक नयन।
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर, रहा झलक, ले लिया हस्त, लक-दक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन, ले अर्पित करने को उद्यत हो गए सुमन
जिस क्षण बंध गया बेधने को दृढ निश्चय, कांपा ब्रह्मांड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
साधु-साधु साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम! क्ह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
नील कमल के गायब होते ही मर्यादापुरुषोत्तम को स्मरण हो आता है बचपन मे उनकी माता, उनके सुंदर और विशाल नेत्रों के कारण उन्हें कमलनयन के नाम पुकारती थीं। अब उन्होंने कमल के पुष्प की जगह पर अपनी कमल जैसी आंखे भगवती को अर्पित करने का निर्णय लिया, अपने शरीर के इस सर्वाधिक सुंदर अंग को देवी को अर्पित करने का निश्चय किया। वह ज्योंहि ही बाण से अपनी दाहिनी आंख को भगवती को समर्पित करने का प्रयास करते हैं, भगवती स्वयं प्रकट होकर उनके हाथ को पकड़ लेती हैं। वह उनके धर्म की प्रति निष्ठा की प्रशंसा करती हैं। 
यहां पर निराला का मन्तव्य स्पष्ट है कि साधना व्यक्तित्व के सर्वश्रेष्ठ अंश का समर्पण मांगती हैं। भगवती आसक्तियों और आकांक्षाओं का बलिदान मांगती हैं। यदि व्यक्ति अपनी प्रतिभा, क्षमता, उत्कृष्टता का समर्पण देवी के चरणों में करता है तो उसे वह वरदान मिलता ही है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम को मिला-
होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन, कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन

शनिवार, 14 मई 2016

सामर्थ्य की विजिगीषु वृति



जो सहज उपलब्ध है, उसमें विस्तार की सतत इच्छा ही विजिगीषु वृत्ति है। यह वृत्ति भारतीय राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय तत्व रही है। राजनीतिक दर्शन हो, प्रक्रिया हो अथवा नीतियां, सभी इस वृत्ति के चहुंओर चक्कर लगाती हैं। यदि किसी राजा अथवा राज्य में विजिगीषु वृत्ति नहीं है,विस्तार की इच्छा नहीं है, तो उसकी योग्यता को शून्य और उसकी अवनति को स्वाभाविक मान लिया जाता था। ऐसे राजा अथवा राज्य, राजनीतिक ङ्क्षचतन की परिधि से बाहर थे। संभवतः इसी कारण विजिगीषु वृत्ति से विहीन हो चुके राजाओं के उबारने वाली किसी नीति का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता और न ही उनके कर्तव्यों के बारे में कोई संकेत मिलते हैं।
बहुत स्पष्ट है कि राजकर्म से संबंधित किसी व्यक्ति में विजिगीषु वृत्ति का न होना अयोग्यता का परिचायक मात्र नहीं बल्कि यह अधार्मिक होने जैसा था। यह इतनी अधम स्थिति मानी जाती थी कि उसके बारे में कर्तव्य-अकर्तव्य की स्थिति का विचार ही नहीं किया गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि परंपरागत राजनीतिक चिंतन में  विजिगीषु वृत्ति राजनीति की पूर्व शर्त तथा मूलभूत विशेषता थी। नीति, कार्यक्रम, विचार और कत्र्तव्य का पूरा राजमहल इसी वृत्ति पर खड़ा होता है। शांतिपर्व में राजनीति की महत्ता की बात हो अथवा चाणक्य द्वारा प्रतिपादित मंडल सिद्वांत, शुक्राचार्य जैसे आदि आचार्यों द्वारा प्रतिपादित षड्गुण नीति हो अथवा विभिन्न राजर्षियों द्वारा आदर्श राजा की आदर्श दिनचर्या का प्रतिपादन, सबके आधार में विजिगीषु वृत्ति ही कार्य कर रही है।
इसे न केवल भारतीय राजनीतिक चिंतन, बल्कि भारतीय भूमि और संस्कृति का भी दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि इस वृत्ति को बाद में न केवल उपेक्षणीय बना दिया गया बल्कि हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। आज भी कुछ लोग सीना ठोंककर यह बताते हैं कि देखो जी! हम लोग कितने  उदात्त थे, आक्रांता आते रहे,जुल्म ढाते रहे, मूल्य ढहते रहे लेकिन हम सहिष्णु बने रहे। हमने कभी हिंसा को नहीं अपनाया।
ऐसे कथन न केवल भ्रामक समझ पर आधारित है बल्कि यह विजिगीषु वृत्ति को अपना प्राणतत्व मानने वाली महान चिंतन परंपरा का अपमान भी है। हां, यहां पर यह बात समझने योग्य है कि भारत में विजय की एक उदात्त और विशिष्ट परंपरा रही है, इसलिए अपने विस्तार तथा मूल्यों की स्थापना के लिए होने वाले युद्ध का प्रभाव सैनिकों और राजाओं तक ही सीमित होता था। आम आदमी ऐसे युद्धों से अछूता रहता था। इसके साथ ही इस परंपरा में विजय को कुछ आदर्श मूल्यों को बचाने और स्थापित करने की प्रक्रिया के साथ भी जोड़ा गया।
विजय की इस विशिष्ट भारतीय परंपरा को ’उत्खात प्रतिरोपण्य कहा जाता था। जैसे कुछ पौधों को उखाड़कर, उसे फिर से उसी जमीन पर रोप दिया जाता है। इस प्रक्रिया में पौधे की मृत्यु नहीं होती बल्कि वह एक खर-पतवार से विकसित होकर वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी प्रकार भारतीय विजेता, पराजित राजा का उच्छेदन नहीं करते थे बल्कि पराजय और कुछ शर्तों को स्वीकार कर लेने के बाद उन्हें उनका राज्य वापस लौटा दिया जाता था और फिर से राजपद पर अभिषिक्त कर दिया जाता था। इस तरह विजेता के प्रभाव में वृद्धि भी होती थी और ढींठ शासकों को सीमा में रहने का सबक भी मिल जाता था। पराजित के अस्तित्व को तभी समाप्त किया जाता, जब वह पराजित होने के बाद भी युद्ध का आकांक्षी बना रहता था।
भूमिकाओं के विस्तार और सीमित होने की इस प्रक्रिया से आमजनता इससे अछूती ही रहती और उसके क्रियाकलापों पर इस तरह की जय-पराजय का खासा असर नहीं पड़ता। सिकंदर के सैनिकों ने अपने विजय अभियान में जब निहत्थे किसानों तक मौत के घाट उतार दिया था तो यह भारतीयों के लिए एक नई घटना थी और इसके कारण भारतीय जनमानस उस बहुत उद्वेलित भी हुआ।
’उत्खात प्रतिरोपण्य की प्रकिया में विजय और विजिगीषु वृत्ति के कई रहस्य छिपे हुए हैं। इसमें विस्तार की इच्छा है, मूल्यों को स्थापित करने की प्रेरणा है, लेकिन यह प्रक्रिया विस्तार और विजय को नरभक्षी बनाने से रोकती है और स्थानीय तत्वों के महत्व को राजनीतिक प्रक्रिया में रेखांकित करती है।
विजिगीषु वृत्ति बहुत नैसर्गिक प्रवृत्ति है। यह हेनरी किसिंजर जैसे आधुनिककूटनयिकों की इस बात से साम्यता और सहमति रखती है कि पूर्ण शांति इस दुनिया की स्वाभाविक अवस्था नहीं है। पराधीन करना और विजेता बनना बहुत ही स्वाभाविक इच्छाएं है और इनका पूर्ण निषेध नहीं हो सकता। यदि इनका निषेध किया जाता है और अपने विस्तार  में विश्वास नहीं किया जाता तो दूसरों के विस्तार का शिकार बनना तय है।  दूसरी तरफ यह भी एक स्थापित तथ्य है कि यदि विजेता बनने की इच्छा को बेलगाम छोड़ दिया जाए तो यह रक्तपात और अन्याय का सबसे बड़ा कारण बनती है। यह वृत्ति, न तो व्यक्तित्व को उदात्त बनने देती है और न ही संपूर्ण।
ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि विजिगीषु वृत्ति के साथ उदात्त मूल्यों को संबंधित किया जाए और दोनों में संतुलन स्थापित किया जाए। भारत में विजिगीषु वृत्ति और उदात्त मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने वाले सूत्रों को न केवल खोजा गया बल्कि व्यावहारिक धरातल पर इन सूत्रों के जरिए लंबे समय तक संतुलन साधा भी गया। इसके कारण एक तरफ राजनीति को समाज में उच्च प्रतिष्ठा और स्थान मिला, वहीं दूसरी तरफ राजनीति देश की संस्कृति और भूमि को संरक्षित और संवद्र्धित भी करती रही। लेकिन बाद में इसी भूमि पर पैदा होने वाले विभिन्न संप्रदायों के कारण, जिनका जोर शांति,अहिंसा और स्वीकार्यता पर अधिक था, यह संतुलन टूटा। विजिगीषु वृत्ति के जरिए अपने योगक्षेम की प्रक्रिया का गैर-आध्यात्मिक और घोर सांसारिक कृत्यों की श्रेणी में रख दिया गया, जो कि प्राथमिकताओं की उपेक्षित और हेय श्रेणी थी।
विजिगीषु वृत्ति को नेपथ्य में धकेले जाने की प्रक्रिया के कारण एक भूगोल और एक भाव के रूप में भारत को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। इस वृत्ति से युक्त व्यक्ति और समाज अपने अगल-बगल होने वाली घटनाओं के प्रति सजग रहता है और अपने ऊपर पढऩे वाले प्रभावों-दुष्प्रभावों का आकलन कर प्रोएक्टिव कदम उठाता है। इसके कारण संभावित खतरों को दरवाजे पर पहुंचने से पहले ही समाप्त कर देता है।  यदि खतरा अधिक प्रबल होने की स्थिति में  दरवाजे तक पहुंच ही जाता है तो भी विजिगीषु वृत्ति से लैस व्यक्ति के पास संभावित खतरे की पूर्व जानकारी होने के कारण इतना समय होता है कि वह उचित रणनीति बनाकर खतरे को जमींदोज कर सके।
विजिगीषु वृत्ति से विहीन व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र अगल-बगल हो रही घटनाओं के प्रति निहायत ही लापरवाह हो जाता है और अपने ’कंफर्ट जोन में  ही सिमटा रहता है। ऐसी स्थिति में खतरा, जो बहुत पहले ही जन्म ले चुका होता है, उसके सामने यकायक प्रकट होता है। इस खतरे से निपटने के  उसके पास आजमाने को बहुत सीमित और अनियोजित विकल्प रहते हैं। या तो वह खतरे को सांसारिक घोषित कर भाग जाता है अथवा उद्वेग में आकर लड़ाई करता है, जिसमें उसका पराजित होना तय होता है।
भारत के सामूहिक अवचेतन मन से विजिगीषु वृत्ति की खुरच-खुरचकर मिटा दिया गया। इसका नाम लेना भी कुफ्र घोषित कर दिया गया। इसके कारण हम आक्रांत होते रहे। इस्लाम की मूल मान्यताओं के बारे में आज भी अनभिज्ञ है, ईसाइयत के विश्व दृष्टि क्या है, इसके बारे में हम ठीक ढंग से नहीं जानते और सभी धर्म एक समान हैं, इसकी रट लगाए रहते हैं। ऐसा नहीं है कि यह पूर्व में की गई गलतियां हैं। यह चलन आज भी बना हुआ है। हम आज भी  बिना तुलनात्मक और विशख्रेषणात्मक अध्ययन के यह मान लेते हैं कि जैसा हम मानते हैं, वैसे ही दूसरे हैं। जब वह दूसरे हमारी मान्यता के विपरीत अपने रूप में हमारे सामने आते हैं तो हम छाती पीटने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कर पाते।
आज भी आईएसआईएस की ’खिलाफत की प्रेरणा अथवा ’गजवा-ए-हिंद की संकल्पना के बारे में भारतीयों में बौद्धिक अथवा रणनीतिक स्तर पर कोई उद्वेलन देखने को नहीं मिलता तो इसका कारण यही है कि हममें विजिगीषु वृत्ति का पूर्ण अभाव है। स्वविस्तार और स्वसंरक्षण की भावना रहने पर पैदा हो रहे प्रत्येक खतरे को आकलन एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में किया जाता है।
इस वृत्ति के अभाव में हम खुद कुछ सुविधाजनक निष्कर्ष निकाल लेते हैं और उसी की पट्टी अपने आंखों पर बांध लेते हैं। परिवेश के प्रति सजगता, विजिगीषु वृत्ति की सबसे बड़ी देन है। यही सजगता न केवल हमारे सामर्थ्य को बनाए रखती है, बल्कि सामर्थ्य को बढ़ाती भी है। इसलिए राष्ट्र के परंवैभव की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का यह प्राथमिक कत्र्तव्य है कि वह राष्ट्र के सामूहिक अवचेतन में विजिगीषु वृत्ति को प्रतिष्ठित करने का यत्न करे। यह वृत्ति अन्य आवश्यक उपायों और वृत्तियों को स्वयं पैदा कर लेगी।

पार्टनर अब मुजाहिद हैं!


लाल सलाम की दुनिया में वैचारिक शुद्धता को परखने और निष्ठाओं को जांचने के लिए मुक्तिबोध की एक पंक्ति का काफी उपयोग किया जाता रहा है। वैचारिक संदिग्धों की कमियों को उघाडऩे के लिए साम्यवादी एक-दूसरे से पूछते रहे हैं ‘पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’
शुरुआती दौर में इस पंक्ति का उपयोग व्यक्ति और विचारधारा दोनों की दिशा को जांचने के लिए किया जाता था। अब इसका उपयोग व्यक्तिगत स्तर पर आपसी लानत-मलानत के लिए ही अधिक किया जाता है। स्वयं को वैचारिक दृष्टि से अधिक प्रतिबद्ध साबित करने के लिए अब भी इस पंक्ति का उपयोग यदा-कदा होता है।
पार्टनर की पॉलिटिक्स जानने का सबसे हालिया घटनाक्रम तब देखने को मिला, जब वीरेंद्र यादव ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए स्वनामधन्य वामपंथी साहित्यकारों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए। उन्होंने यह सवाल एक लेख लिख कर उठाए, जिसका शीर्षक मुक्तिबोध की यही चर्चित पंक्ति थी। प्रगतिशील होने का दावा करने वाली यह विचारधारा अपनी अमर्यादित प्रतिक्रियाओं के कारण जानी जाती है। ऐसा इस प्रकरण में भी दिखा। वीरेंद्र यादव की अवसरवादिता के उदाहरण प्रस्तुत किए गए और उनसे भी यही सवाल दाग दिया गया कि ‘पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? 
हैरत की बात यह है कि बात-बात पर पार्टनर की पॉलिटिक्स पूछने वाली इस विचारधारा की पॉलिटिक्स पर सवाल उठने बंद हो गए हैं। वैचारिक विचलन को विषय बनाकर एक-दूसरे का कपड़ा उतारने पर उतारू लोग, अपनी विचारधारा की दशा-दिशा को लेकर आत्मघाती लापरवाही से ग्रसित हैं, जबकि पूरी विचारधारा में विचलन-स्खलन स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं। 
पिछले कुछ दशकों से साम्यवादी दलों के ऐजेंडे में किसान-मजदूर, पूंजीवाद-साम्राज्यवाद, भाषा-संस्कृति  पीछे छूट गए हैं। भाषायी मुद्दे के जरिए साम्यवादियों की प्राथमिकता में आए परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है। डा. रामविलास शर्मा के बाद साम्यवादी दुनिया में हिंदी भाषा को लेकर कोई संघर्ष नहीं दिखता। हद तो तब हो जाती है, जब पुरुषोत्तम अग्रवाल जैसे लोग संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षााओं में घोषित रूप से अंग्रेजी का पक्ष लेते हैं और अंग्रेजी को योग्यता का पैमाना बनाने की वकालत करते हैं। संभवत: भारत में मजलूमों के शोषण का सबसे बड़ा माध्यम अंग्रेजी भाषा है। इसके कारण सामान्य पृष्ठभूमि के लोगोंं को अपनी पहचान बनाने, व्यवस्था में स्थान बनाने के लिए हर कदम पर बाधा खड़ी होती है, लेकिन साम्यवादी भाषा के लिए कुछ नहीं बोलते। 
देखते ही देखते साम्यवादियों की प्राथमिकता सूची में सांप्रदायिकता सबसे ऊपर आ गई है। हर तरह की सांप्रदायिकता का विरोध किया ही जाना चाहिए। लेकिन इस विचारधारा में दिवालियापन इस हद तक पहुंच गया है कि यह सांप्रदायिकता से लडऩे के नाम पर जिहादियोंं की शब्दावली में बोलने लगा है। 
हालिया घटनाक्रमों से तो ऐसा लगता है कि विभ्रम का लाभ उठाकर इस विचारधारा को जिहादी तत्वों ने ‘हाईजैक’ कर लिया है। समानता के सिद्धांत पर विश्वास रखने वाली विचारधारा, सभी पंथों को अफीम मानने वाली विचारधारा एक पंथ विशेष की कट्टरता का खुला समर्थन करने की स्थिति में कैसे पहुंच जाती है और सभी तरह के शोषण एक ही पंथ में कैसे दिखाई देने लगते हैं, इसकी गंभीर पड़ताल आवश्यक है। 
महिला-मुक्ति इस विचारधारा के प्रिय विषयों में एक रहा है। महिला-मुक्ति संबंधी चिंतन की पड़ताल के जरिए इस विचारधारा में आए भटकाव और जिहादी तत्वों के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया जा सकता है। यहां पर इस पचड़े में नहीं पड़ा जा रहा है कि स्त्री-मुक्ति संबंधी  इस विचारधारा की मान्यताएं कितनी सही और कितनी गलत हैं। लेकिन समानता को अपना सर्वोच्च आदर्श मानने वाली विचारधारा से इतनी अपेक्षा तो की ही जाती है कि वह सभी पंथों की स्त्रियों की मुक्ति की कामना करे, लेकिन व्यवहार में ऐसा दिखता नहीं।
इस विचार से जुड़े बुद्धिजीवी एक तरफ स्त्री-मुक्ति को ‘वैवाहिक-बलात्कार’ की सीमा तक घसीटते हैं। अंतरंग संबंधों को भी कानूनी पहरे में लाने की बात करते हैंं। विवाह में भी बलात्कार की संभावनाओं को तलाशते हैं और ऐसे ‘अत्याचार’ को दूर करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए दिखते हैं। दूसरी तरफ समान नागरिक संहिता के मुद्दे को सांप्रदायिक ठहराकर, एक पंथ विशेष की महिलाओं को पालन-पोषण जैसे मूलभूत अधिकार प्राप्त करने से वंचित किए हुए हैं। बिना किसी कानूनी प्रक्रिया अपनाए, जब मन में तीन बार तलाक कहकर, स्त्रियों के जीवन को मंझधार में झोडऩें वाली व्यवस्था के विरोध में उनके मुंह से आवाज नहीं निकलती। हद तो तब हो जाती है, जब इस पंथ विशेष की महिलाओं को कानूनी कवच प्रदान करने के सरकारी प्रयासों का ये मित्र विरोध करने लगते हैं।
धर्मस्थलों के प्रवेश संबंधी विषय में भी ऐसा ही दोमुंहापन दिखता है। किसी एक शनि मंदिर में प्रवेश न दिए जाने का मसला इनके लिए स्त्री-मुक्ति का प्रश्र बनता है और इस प्रश्र को जोर-शोर से उठाकर एक समुदाय विशेष को पिछड़ा और सामंती घोषित कर दिया जाता है, लेकिन सभी मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश निषेध, इस वर्ग के लिए कोई मुद्दा नहीं बनता और न ही इसके कारण वह पंथ हिकारती बनता है। 
समानता के नारे में अमानवीय असमानताओं की एक पूरी शंृखला नजर आती है। यह दिन-ब-दिन बढ़ और मजबूत हो रही है। वामपंथी दृष्टिदोष का एक ऐसा ही रोचक उदाहरण अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भी देखने को मिलता है। 
साम्यवाद अंतर्राष्ट्रीय विचारधारा होने के दंभ से ग्रसित है और साम्यवादी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के सबसे बड़े विशेषज्ञ होने के रोग से ग्रसित हैं। दुनिया में कहीं भी कुछ हो रहा है, उसका निष्कर्ष देना साम्यवादी अपना अधिकार मानते हैं और निष्कर्ष यह होता है कि दुनिया की सारी गड़बडिय़ों का कारण साम्राज्यवादी अमेरिका है। 
हाल के दशकों में यह अंतर्राष्ट्रीय समझ फिलिस्तीन-इजरायल के मामलों में काफी सजग दिखती है। इसमें भी निष्कर्ष तय होते हैं और इजरायल की दानवी भूमिका बताई जाती है और फिलिस्तीन को पीडि़त। कुछ हद तक यह सही भी है, लेकिन हद तब हो जाती है, जब फिलीस्तीन के पीडि़त होने की बात के जरिए अरब जगत से फैल रहे आतंकवाद को जायज ठहराने की कोशिश होने लगती है और फ्रांस पर होने वाले हमलों को स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताया जाने लगता है। एक समझ का एक पहलू यह भी है कि यह सुदूर फिलीस्तीन शरणार्थियों की पीड़ा तो महसूस करती है, लेकिन तिब्बती शरणार्थियों की पीड़ा इसे छू भी नहीं पाती। कश्मीर में पंडितों के विस्थापन को इस विचारधारा ने कभी नोटिस में ही नहीं लिया। 
समानता के सिद्धांत में जिहादी नारों की घुसपैठ का सबसे नंगा प्रदर्शन तो जेएनयू प्रकरण में हुआ है। समानता के पैरोकार जिस तरह से भारत की बर्बादी के लिए जंंग का ऐलान करते और देश के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए अल्लाह से गुहार करते हुए सामने आए, उसे देखकर पूरा देश स्तब्ध रह गया। 
स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के समय नक्सल-चर्च गठजोड़ की बात सामने आई थी। अब यह नक्सल-चर्च गठजोड़, नक्सल-चर्च-जिहादी त्रिकोण में तब्दील हो चुका है। सबसे खतरनाक बात यह है कि इस गठजोड़ में जिहादी तत्वों ने केंद्रीय भूमिका अख्तियार कर ली है। अब जिहादी तत्व साम्यवादियों के समानता के मुखौटे और उससे जुड़ी शब्दावलियों का उपयोग कर रहे हैं। दूसरी तरफ साम्यवादी केवल जिहादियों को वैधता प्रदान नहीं कर रहे हैं, बल्कि जिहादी स्वप्रों और नारों का उपयोग कर हैं। साम्यवादी विचारधारा में जिहादी घुसपैठ इतनी प्रबल है कि साम्यवाद का चोला अब जिहादी दिखने लगा है। शायद इसी कारण अब कहीं से यह आवाज नहीं उठ रही है कि पार्टनर! हमारी पॉलिटिक्स क्या है? आखिरकार, पार्टनर मुजाहिद जो बन गए हैं और मुजाहिद न तो ऐसे प्रश्र करते हैं और न ही ऐसे प्रश्र सहते हैं।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

महिला सशक्तीकरण की मातृभाषा

सहज और मौलिक चिंतन की सर्वाधिक संभावनाएं परिवेश की भाषा में निहित होती हैं। कोई भी ऐसा समूह अथवा वर्ग जो हासिए पर हो और जिसको सशक्त बनाए जाने के प्रयास चल रहें हों, उसे मूलभूत सुविधाएं परिवेश की भाषा में, मातृभाषा में, उपलब्ध कराना व्यवस्था का मूलकर्म बन जाता है।
सशक्तीकरण के कई पहलू होते है। भाषा उन सभी पहलुओं से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्बंधित होती है। यह शैक्षणिक दृष्टि से यह अधिक सस्ती, सुलभ और समावेशी शिक्षा का आधार तैयार करती है, स्वास्थ्य सम्बंधी जटिलताओं को सुबोध बनाकर सजगता को बढ़ाती है, आर्थिक परिदृश्य को अधिक विस्तृत और समावेशी बनाती है। भाषा का सबसे महत्वपूर्ण अवदान तो सांस्कृतिक होता है। मातृभाषा न केवल व्यक्तियों को सांस्कृतिक प्रवाह से जोड़े रखती है बल्कि यह आत्मबल को बनाए रखने का भी महत्वपूर्ण साधन है।
मातृभाषा महिला सशक्तीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में कैसे सहायक हो सकती है इस बात को कुछ उदारण के जरिए समझा जा सकता है। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने के लिए मोबाइल पर मैसेज भेजने शुरू किए हैं। यह संदेश एनीमिया की स्थिती खान-पान की सावधानियां और दिनचर्या को लेकर होते हैं। यह जानकारी वास्तव दूर-दराज में रहने वाली महिलाओं के  बहुत उपयोगी है। लेकिन दुर्भाग्य से ये सभी मैसेज अंग्रेजी में भेजे जाते है। जो महिलाएं पर्याप्त पढ़ी लिखी हैं, अंग्रेजी ज्ञान रखती हैं, उनके लिए इन संदेशों का कोई खास मतलब नहीं रह जाता क्योंकि वह इन सभी सूचनाओं को प्रायः जानती ही है। यह उन महिलाओं के लिए भी किसी काम के नही होती जिनको यह संदेश भेजे जाते है अथवा लिनके लिए यह जानकारी बहुत उपयोगी साबित हो सकती है क्योकि वह अंगे्रजी भाषा में लिखे संदेशो को ठीक ढंग से समझ नही पाती। इस तरह से दोनो स्थितियों में अंग्रेजी में लिखे स्वास्थ्य के प्रति सजगता पैदा करने वाले ये संदेश सफेद हाथी बन जाते है।
यदि यहि संदेश हिन्दी भाषा अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में संप्रेषित किए जाएं तो जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य को ठीक रखने और कुपोषण से छुटकारा पाने सफलता प्राप्त की जा सकती है। और यह सफलता स्त्री सशक्तीकरण का ही एक रूप और महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी मातृभाषा महिला सशक्तीकरण को ऊंचे मुकाम तक पहुंचा सकती है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पिछले दो दशको में बालिका नामांकन दर में काफी सुधार हुआ है। लेकिन दो कारण ऐसे है जो शिक्षा क्षेत्र में महिला सशक्तीकरण के लिहाज से मातृभाषा को बहुत महत्वपूर्ण बना देते है।
पहला लड़कियों की ड्राप आउट की दर का अधिक होना और उनकी दूरस्थ शिक्षा पर अनकी अधिक निभर््ारता तथा दूसरा लड़कियों की शिक्षा केा लेकर लापरवाही और कम खर्च करने की मानसिकता। आर्थिक स्थिती तथा शादी विवाह जैसे अन्य कारणांे की वजह से लड़कियों के बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। पहले तो डाप आउट होेने के बाद लड़कियों के पास शिक्षा के विकल्प समाप्त हो जाते थे। लेकिन दूरस्थ शिक्षा प्रारम्भ होने के बाद अपनी शिक्षा केा आगे जारी रखने की नया तरीका लड़कियों को मिला। दुर्भाग्यवश भाषायी बाधाओं के कारण दूरस्थ शिक्षा में निहित संभावनाओ का संपूर्ण लाभ लड़कियों को नही मिल पा रहा है। दूरस्थ शिक्षा में व्यक्ति को स्वयं की प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ना होता है और उन्हें नाममात्र की औपचारिक सहायता से ही विषयों को समझना होता है। मातृभाषा की बजाय किसी अन्य भाषा में विषय सामग्री के होने से समझने की प्रक्रिया बाधित होती है।
अपनी भाषा में समग्री उपलब्ध होने पर सारा जोर विषय को समझने पर लगता है जबकि अन्य भाषा में सामग्री उपलब्ध होने पर विद्यार्थी की उर्जा और मेधा का बड़ा भाग भाषा को समझने में ही खर्च हो जाता है। इसके कारण विषय पर आवश्यक पकड़ नहीं बन पाती और विद्यार्थी इसके कारण कठिन प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाता है। यह हैरत की बात है कि दूरस्थ शिक्षा कि इस सीमा से परिचित होने के बावजूद इग्नू द्वारा संचालित पाठयक्रमों में से साहित्य और कुछ गिने चुने विषयों को छोड़कर अधिकांश विषयों की पाठय सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध कराई जाती है। और अंग्रेजी में ही परीक्षा की अनिवार्यता विद्यार्थी के सामने रख दी जाती है इनकी सबसे अधिक मार शिक्षा ग्रहण करने की इच्छुक लड़कियों पर पड़ती है।
इन दोनों विवशताओं के कारण या तो वे आगे पढ़ाई जारी रखने का विचार ही छोड़ देती हैं अथवा गलाकाट प्रतस्पर्धा में पीछे रह जाने को अभिशप्त हो जाती हैं। यदि दूरस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम को हिंदी में मुहैया कराया जाए और अंग्रेजी में ही परीक्षा देने की अनिवार्यता को हटा लिया जाए तो इस सबसे अधिक लाभ लड़कियों को प्राप्त होगा। इन कारणों से आधी दुनिया के सामने संभावनाओं का संसार खुल सकेगा और शिक्षा जगत में उनके समक्ष आने वाली दुश्वारियां कुछ कम हो सकेंगी। यह महिला सशक्तीकरण को भी मजबूती प्रदान करेगा।
एक अन्य कारण से भी मातृभाषा में शिक्षा, महिला सशक्तीकरण के लिहाज से उपयोगी है। यह दुर्भाग्यजनक किंतु कटु सत्य है कि अब भी अभिभावकों की तरफ से लड़का-लड़की को दी जाने वाली शिक्षा में विभेद देखने को मिलता है। यह विभेद अंग्रेजी-हिंदी माध्यम के विद्यालयों के चयन के रूप में सामने आता है। लड़के को इंग्लिश मीडियम और लड़की को हिंदी माध्यम के स्कूल में पढ़ाने की प्रवृत्ति समाज में दिखायी पडती है। इसके कारण उच्च -शिक्षा में जहां पर अब भी अंग्रेजी का बोलबाला है, लड़कियों को पीछे रह जाना पड़ता है। यदि उच्च शिक्षा के समस्त द्वार हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए खोल दिए जाएं तो इससे सबसे अधिक लाभी लड़कियों को ही मिलेगा।
भारत में लंबे समय तक इनसाइड वोमनःआउटसाइड मैन की धारणा का गहरा प्रभाव रहा है। अब यह धारणा टूट रही है। महिलाएं बाहर निकल रही हैं और घुल-मिल रही हैं। लेकिन उनकी स्वस्थ सामाजीकरण में एक प्रमुख बाधा अंग्रेजी के कारण पैदा हो रही है। सामान्य, मेहनती, प्रतिभावान महिला भी अंग्रेजी के आतंक से प्रतिदिन आतंकित होती हैं। लंबे समय तक घर से बाहर न निकलने के अभ्यस्त आधी दुनिया पर अंग्रेजी प्रतिदिन हीनता का भाव रचती है और उसे गाढ़ा करती है।
इस तरह मातृभाषा, मातृशक्ति के सशक्तीकरण का एक सशक्त माध्यम है। लेकिन निहित स्वार्थ, अंग्रेजी के मोह तथा अभिजन वर्ग के दुराग्रह के कारण व्यवस्था आज तक मातृभाषा को महिला सशक्तीकरण के  उपकरण के रूप में रेखांकित नहीं कर सकी है। हैरत तो यह है कि जो भारतीय परिप्रेक्ष्य से परिचित हैं वे भी मातृभाषा और मातृशक्ति के आपसी संबंधों को रेखांकित नहीं कर पा रहे हैं। इस अपरिचय के कारण महिलाओं को भाषायी मानवाधिकार प्रदान करने के लिए कोई समुचित पहल नहीं दिख रही है।

मूलभूत इच्छा का वैकल्पिक विमर्श

एक आदर्श शासन प्रणाली की चाहत हमेशा से मानवीय चिंतन और गतिविधियों के
केंद्र में रही है। यह एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक इच्छा है। महाभारत के
शांतिपर्व में 'स्थितप्रज्ञ राजाÓ की खोज हो अथवा प्लेटो द्वारा 'फिलॉसफर
किंगÓ का खोजा जाना, इन सबके केंद्र में आदर्श शासक और शासन प्रणाली ही
है।
'शासक केंद्रितÓ विचारों से लंबी दूरी तय करते हुए अब हम 'संस्था
केंद्रितÓ, 'व्यवस्था केंद्रितÓ शासन प्रणालियों के दौर में जी रहे हैं।
इन प्रणालियों में लोकतंत्र सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। अपने देश
भारत में आजादी के बाद लोकतंत्र का 'वेस्टमिंस्टर संस्करणÓ अपनाया गया,
लेकिन अपनाने के 65 वर्षों बाद भी यह प्रणाली निर्धारित अपेक्षाओं को
पूरा करने में बुरी तरह विफल साबित हुई है। इसके कारण देश में हर स्तर पर
एक व्यग्रता देखने को मिलती है। भानू धमीजा की पुस्तक 'व्हाई इंडिया
नीड्ज प्रेजिडेंशियल सिस्टमÓ इसी व्यग्रता की सकारात्मक और समाधानपरक
अभिव्यक्ति है।
मीडिया और प्रकाशन जगत से संबद्ध होने के कारण लेखक भानू धमीजा का
व्यवस्थागत विकृतियों से सीधा वास्ता पड़ा है। लेेखक ने इन विकृतियों को
एक सच्चे भारतीय की तरह महसूस किया है और यह भारतीयता की छटपटाहट
वैकल्पिक व्यवस्था तलाशने के श्रमसाध्य रास्ते पर धकेलती है। पुस्तक की
भूमिका में ही लेखक ने 'इंडिया इज माई ओनली कॉजÓ लिखकर अपनी मूल चिंता को
बहुत स्पष्ट तरीके से व्यक्त कर दिया है।
पुस्तक में बहुत शोधपूर्ण तरीके से इस बात को स्थापित किया गया है कि
सत्ता के अतिशय सकेंद्रीकरण के कारण भारतीय शासन प्रणाली गंभीर खतरों का
सामना कर रही है। नेहरू के लगाव के कारण किस तरह संसदीय शासन प्रणाली
स्वीकार की गई और उनके प्रभाव ने किस तरह इसकी दिशा-दशा तय की, इसका बहुत
रोचक लेखा-जोखा इस पुस्तक में मिलता है। प्रसिद्ध संविधानविद् सुभाष
कश्यप के एक कथन को उद्घृत कर लेखक ने बहुत चुटीले तरीके से वर्तमान शासन
प्रणाली पर व्यंग्य किया है। सुभाष कश्यप के अनुसार 'यदि जवाहर लाल
नेहरू भारत के प्रथम राष्ट्रपति होते और राजेंद्र प्रसाद देश के पहले
प्रधानमंत्री होते तो आज देश का राजनीतिक तंत्र, संसदीय से अधिक
राष्ट्रपति प्रणाली की तरफ झुका हुआ होता और इसके लिए मौजूदा संविधान में
किसी बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती।Ó यह कथन बताता है कि भारतीय शासन
प्रणाली कितनी व्यक्ति केंद्रित है।
इतिहास के पुराने पन्नों और वर्तमान के पड़ावों की यात्रा के बाद लेखक इस
निष्कर्ष पर पहुंंचा है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र के मूल में ही
गड़बड़ी है। इसलिए, सुधार के जरिए इसे सही रास्ते पर लाने के कोशिशों का
असफल होना तय है। ऐसे में भारत को अन्य शासन प्रणालियों को जांचने की
दिशा में आगे बढऩा चाहिए। भानू को लगता है कि अमरीका की राष्ट्रपति
प्रणाली भारत के लिए सबसे अधिक मुफीद है। उन्होंने राष्ट्रपति प्रणाली के
कई तथ्यों को रेखांकित करके अपनी बात को पुष्ट किया है। पहला तथ्य यह है
कि संघात्मक संप्रभुता के कारण राष्ट्रीयता और स्थानीयता दोनों की
भावनाएं संतुष्ट होती हैं और इसके कारण शासन-प्रशासन को पहचान के
प्रश्रों को सुलझाने के लिए बहुत श्रम नहीं करना पड़ता। इसी तरह न्यायिक
पुनरावलोकन व्यक्ति के बजाय संस्थान और कानून को सर्वाेपरि नियंत्रक के
रूप में स्थापित करता है। राष्ट्रपति प्रणाली में सरकारों का कार्यकाल
स्थिर होता है। इसके कारण राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय आत्मबल का विकास
होता है। इसके उलट संसदीय शासन प्रणाली में जोड़-तोड़ की राजनीति के कारण
सरकारें बनती-बिगड़ती रहती हैं, जिसके कारण असुरक्षा की भावना पनपती है
और दूरगामी लक्ष्य तय नहीं हो पाते। इसी तरह कानूनों का कम हस्तक्षेप भी
व्यक्ति में पहल करने की भावना भरता है।
निश्चित रूप से अमरीका में राष्ट्रपति प्रणाली काफी सफल रही है।
शासन-प्रशासन के कई अच्छे उदाहरण वहां से आए हैं। इस प्रणाली को अपनाना
एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। लेखक ने पूरे विमर्श को खुला और
अकादमिक रखा है। इसीलिए, पुस्तक की भूमिका में वह अपने विचारों को ज्यों
का त्यों स्वीकार करने के बजाय अमरीकी संविधान निर्माताओं की तीक्ष्ण
बुद्धि पर विश्वास रखने को कहता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि किताब
का जोर किसी निष्कर्ष को थोपने की बजाय एक वैकल्पिक विमर्श को खड़ा करने
पर है।
इस किताब में कई मूलभूत प्रश्रों का उत्तर मिलना शेष रह जाता है। मसलन,
क्या पूरी की पूरी व्यवस्था को आयात करना एक फलदायी प्रक्रिया साबित
होगी। इतिहास इसके बारे में हमें सजग रहने और चयनित दृष्टिकोण अपनाने का
सबक देता है। इसके बावजूद, भारत के उज्ज्वल भविष्य के आकांक्षी प्रत्येक
नागरिक, अकादमिक जगत, पत्रकार बिरादरी तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए
यह पुस्तक वैकल्पिक व्यवस्था के विमर्श  हेतु एक प्रस्थान बिंदु की तरह
है। विमर्श का फलक विस्तृत बनाने के लिए पुस्तक का हिंदी संस्करण सहयोगी
साबित होगा।
पुस्तक : व्हाई इंडिया नीड्स दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम
प्रकाशक : हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्ज, इंडिया
कुल पृष्ठ : 373
दाम : 550 रुपए (पेपर बैक)

महती और आवश्यक परंपरा की खोज

वैश्वीकरण के दौर में एक अजीब सा विरोधाभास बडे वेग के साथ आकार ले
रहा है। कास्मोपाॅलिटन होने के नारे के बीच पूरी दुनिया में स्वयं को
पहचानने और अपनी जडों को खोजने की व्यग्रता भी बढी जा रही है।
अधिकांश संजीदा विचारक अब इस तथ्य को बहुत स्पष्टता के साथ स्वीकार करने
लगे हैं कि पूरी दुनिया में जो संघर्ष दिख रहा है, वह कुछ नहीं बल्कि
अपनी पहचान के श्रेष्ठ अंश को खोजने और उसे पुनः साकार करने का
संघर्ष है। दाएस का खिलाफत का दुःस्वप्न हो, रूस का क्रीमिया में हस्तक्षेप
हो अथवा चर्च द्वारा सोलहवीं शताब्दी को पैपेसी को स्थापित करने का
प्रयास हो, सभी अपने अतीतकाल काल के स्वर्णयुग की ज्यांे की त्यांे वापसी
चाहते हैं।
इस स्थिति में भारत की स्थिति बहुत अनूठी और सर्जनात्मक है। यह स्थिति
भारत की परंपरा के प्रति अनूठी समझ के कारण है। यहां पर परंपरा का मतलब,
नियम-कानूनों का वाह्य ढांचा नहीं बल्कि सनातन तत्व का बोध है। सनातन
तत्व को सामयिक बनाना भी भारतीय परंपरा का एक आवश्यक अंश होता है।
इसलिए यहां पर परंपरा जड नहीं है, वह सतत प्रवाहित होती रहती है, नए-नए
कलेवरों के साथ। हां, उसका स्वत्व हमेशा एक रहता है। इसीलिए यह परंपरा
पुनरुत्थान से अधिक नवोत्थान पर विश्वास करती है। इसमें ठहराव नहीं है
बल्कि यह देश, काल, पात्र के अनुसार सत्य को परिष्कृत और प्रवाहित करती है।
यह व्यावहारिक भी है क्योंकि अतीत को जिंदा नहीं किया जा सकता। नई
परिस्थितियों के अनुसार किसी भी भावना का सर्जनात्मक पुनर्गठन जरूर किया
जा सकता है।
भारत में अपने मूलचरित्र को समझने के प्रयासों में बढोतरी हुई है।
लेकिन इन प्रयासों का स्वरूप बहुत ही सर्जनात्मक और सकारात्मक है। यहां पर
अतीत को पुनर्जीवित करने के प्रयास नहीं हो रहे हैं, बल्कि इससे ज्यादा
जोर उस भावना को समझने पर है, जिसके कारण परंपराएं और व्यवस्थाएं
खडी हुईं ताकि उस भावना के अनुरुप नई परंपराए गढी जा सकें। इससे सातत्य
और परिवर्तन दोनों को साधा जा सकता है। अपनी पहचान से जुडे रहकर भी
वैश्विक हुआ जा सकता है और सबसे बडी बात यह कि कूपमंडूकता की स्थिति से
बचा सकता है।
प्रो.कौशल किशोर मिश्र की किताब महाभारत में राजधर्म, भारतीय स्वत्व
बोध की इसी दिशा में किया गया एक सार्थक प्रयास है। प्रो मिश्र ने
भारतीय चिंतन के महाकोश को आधार मानकर भारतीय राजनीतिक परंपरा के
मूल अधिष्ठानों को समझने-समझाने की कोशिश की है। इससे पहले भारतीय
राजनीतिक चिंतन को समझने की कोशिशंें अधिकांशतः आचार्य कौटिल्य तक
ही जाती है। छिटपुट प्रयास शुक्रनीति और महाभारत के शांतिपर्व पर भी
हुए हैं। प्रो.मिश्र ने संपूर्ण महाभारत को आधार मानकर भारतीय चिंतन
को समझने की कोशिश की है, इसलिए उनके कार्य का परिप्रेक्ष्य बहुत विस्तृत
है और महत्ता अधिक है।
विषय वस्तु विस्तृत होने के कारण पुस्तक दो खंडों में विभाजित हैं।
पहले खंड में भारतीय राजनीति परंपरा और महाभारत, महाभारत में धर्म
नैतिकता और राजनीति, महाभारत में राज्य एवं राजा का स्वरूप तो दूसरे
खंडमें  महाभारत में राजत्व की शक्ति एवं दायित्व तथा साामजिक व्यवहार
एवं राजधर्म पर प्रकाश डाला गया है। महाभारत केंद्रित होने के बावजूद
लेखक ने राज्य शास्त्र के प्रमुख चिंतकों को मतों को समावेश कर ग्रंथ
को अधिक समग्र बना दिया है। शुक से लेकर कामंदक तक के विचारों का पुट
देकर महाभारतीय राजधर्म के मर्म का व्याख्यायित करने की कोशिश की गई
है।
पुस्तक में भारतीय राजनतिक चिंतन से संबंधित कई भ्रांतियों को दूर
करने की कोशिश की गई है। पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में राजतंत्र की कंेद्रीय
एकाधिकारवाद को माना जाता है और इसी एकाधिकारवादी अवधारणा को भी
भारतीय राजतंत्र पर थोपकर उसकी व्याख्या करने की कोशिश की जाती है,
जिसके कारण भारतीय राजतंत्र से कई सकारात्मक पक्ष गायब हो जाते हैं। लेख
इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारतीय संदर्भों मे ंराजतंत्र को
एकाधिकारवाद का प्रर्याय नहीं माना जा सकता- ’प्राचीन भारत में वैदिक
राष्ट्रª का स्वरूप् मुख्यतः राजतंत्रात्मक रहा है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि
राजतंत्र एकात्मक प्रणाली है। राजतंत्र आधुनिक लोकतंत्र से भी अधिक व्यापक
और जनाभिमुख है। ऋ़ग्वेद में गणों का उल्लेख है।‘(प्रथम खंड-पृष्ठ
6)
इसीतरह राजतंत्र को निरंकुश और स्वच्छंद मानने को भारतीय संदर्भों में
लेखक अप्रासंगिक मानता है। यहां पर राजदंड मे धर्मदंड का अंकुश होता
था, जो उसे नागरिक-कल्याण के प्रथम कर्तव्य के प्रति सचेत रखता था। सभी
विजिगिषु राजाओं के दैनिक व्यवहार के लिए भारतीय परंपरा एक कठोर
जीवनशैली की तरफ संकेत करती है, जिसमें स्वच्छंदता के लिए स्थान कोई
स्थान नहीं है। राजतंत्र में राजा के ऊपर ऐसे कठोर नियंत्रण के कारण ही
महाभारत के शांतिपर्व में स्पष्ट रूप से यह कह दिया गया है कि समस्त त्याग
और साधनाओं का राजधर्म में समावेश है। राजा के लिए पृथक से तपस्या
करने की आवश्यकता नहीं है। उसके कार्य की प्रकृति ऐसी है कि यदि वह ठीक
ढंग से अपने उत्तरदायित्वों को निर्वहन करता है तो उसी में उसकी तपस्या
और साधानाएं स्वतः हो जाती हैं।
 राजतंत्र के उदारपक्ष और जनाभिमुखता की तरफ संकेत करते हुए लेखक कहता
है कि -‘वैदिक राजनीति का आधार सामाजिक सेवा है। इस उद्देश्य की प्राप्ति
में राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना होती है। राजा स्वामित्व नहीं सेवा का
हेतु है। राजा का अभीष्ट है कि वह राष्ट्र का विकास करे। सामाजिक
अर्थव्यवस्था में उत्पन्न विश्रृंखलता को दूर करे। विश की रक्षा एंव सैनिक
आवश्यकता के आधार पर राष्ट्र एंव राजा की शक्ति का विकास होता है।
राष्ट्रधारक के रूप् में वह राष्ट्रस्यमूर्धाय है। पायुर्विश होने के कारण वह
प्रजापालक है। राजनीति की इसी विशेषता में लोकतंत्र के समस्त मूल्य समाहित
हैं।’ (प्रथम खंड-पृष्ठ 7)। लेखक की इस दृष्टि से सहमत-असहमत हुआ जा
सकता है, लेकिन किताब की ऐसी स्थापनाएं एक वैकल्पिक भारतीय परिप्रेक्ष्य की
रचना करने सफल होती हैं, जिसमें भारतीय राजनीतिक चिंतन और परंपराओ
को बेहतर ढंग से समझने में सहूलियत होती है।
संपूर्ण किताब में लेखक महाभारत में प्रणीत इस तथ्य पर सर्वाधिक ध्यान
आकर्षित करता हुआ प्रतीत होता है कि राजधर्म, भी वृहदतर धर्म का एक
अंश है। और दूसरा यह कि विभिन्न सापेक्षिक धर्मों में इसका स्थान उच्च
है। क्योंकि अन्य धर्मों के उचित निर्वहन से जहां स्वयं का अथवा कुछ
व्यक्तियों का कल्याण होता है वहीं राजधर्म से संपूर्ण समाज और संस्कृति
का कल्याण होता है। राजधर्म के पथभ्रष्ट होने पर अन्यधर्म अपने आप
पथभ्रष्ट हो जाते हैं क्योंकि सभी कर्तव्यों के निर्वहन का परिवेश
राजधर्म ही रचता है। संभवतः इसीलिए महाभारत में सभी धर्मों को
राजधर्म में ही प्रतिष्ठित माना गया है।
पुस्तक में राजधर्म से संबंधित अन्य विषयांे पर भी रोचक सामग्री प्रदान
की गई है। जैसे कि महाभारतकालीन अस्त्रों का विस्तृत परिचय दिया गया है।
कणक, चक्राश्म और शतघ्नी जैसे अस्त्रों की जानकारी पाठकों को विस्मृत कर
सकती है। जिस लौहयंत्र क गर्भस्थ गोलियां आग्नेय द्रव्य की शक्ति से
उल्काओं की तरह चारों ओर विकीर्ण हो जाएं, उसे कणक कहते हैं।
आग्नेय औषधि के बल से फेंके एग प्रस्तरखंडों द्वारा जो शस्त्र एक साथ
सैकडों मनुष्यों की हत्या कर सके, उसे शतघ्नी कहते हैं। ऐसे अनकों
प्रकरण ग्रंथ को रोचक बनाए रहते है।
इतने गंभीर और महत्वपूर्ण ग्रंथ में प्रूफ की त्रुटियां कई जगहों पर
खटकती हैं।पुस्तक में कई जगहों पर विषयांतर भी हुआ है। पुस्तक की
कीमत को शोध ग्रंथों की तरह रखा गया है। यह सामान्य पाठकों को
बहुत अधिक प्रतीत हो सकता है। फिर भी भारतीय राजनीतिक ंचितन के मर्म से
परिचित होने के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी है और भारतीय वैकल्पिक
परिप्रेक्ष्य को रचने और समझने के उत्सुक पाठकों-विद्वानों को इस ग्रंथ
को जरुर पढना चाहिए।

रविवार, 6 दिसंबर 2015

पंथनिरपेक्षता का नया पाखंड


 भारत में पंथनिरपेक्षता की बहस 'नित नई ऊंचाइयोंÓ को छू रही है। पहले
इसकी सीमा में 'पंचतत्त्वÓ ही आते थे लेकिन पिछले कुछ महीनों में इसने
ऊंची छलांग लगाते हुए सूर्य नामक 'महातत्त्वÓ को भी अपने जद में ले लिया
है। अब सूर्य और सूर्य की किरणें भी पंथनिरपेक्षता की बहस का हिस्सा बन
गई हैं। संभवत: इसी कारण योग दिवस के दौरान कई हलकों से यह आवाज आई कि,
क्योंकि सूर्य और उसकी किरणों की पंथनिरपेक्षता संदिग्ध है, इसलिए सूर्य
नमस्कार करना भी हमारे संवैधानिक 'सेकुलरÓ ढांचे के खिलाफ है। इस
'वैज्ञानिकÓ तर्क को 'प्रगतिशीलÓ दुनिया में व्यापक स्वीकृति और सराहना
मिली और इसके आधार पर यह साबित करने की कोशिश की गई की योग एक
सांप्रदायिक कृत्य है।
सूर्य से थोड़ा नीचे उतरकर शब्दों की दुनिया में आएं, तो वहां
पंथनिरपेक्षता नए प्रतिमान, नए कीर्तिमान गढ़ती हुई दिखती है।
पंथनिरपेक्षता में नए आयाम जोडऩे के प्रक्रिया भारत में राजनीतिक बदलाव
की आहट  के साथ शुरू हो गई थी। भाजपा द्वारा अपना प्रधानमंत्री का
उम्मीदवार घोषित करने के साथ तरह-तरह के फतवे साहित्य जगत और विद्वत जगत
से आने लगे थे। उस समय कई स्वनामधन्य साहित्यकारों ने घोषणा की थी कि वह
उस भारत में रहना नहीं पसंद करेंगे, जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
होंगे। ऐसे साहित्यकारों में से एक अनंत विजय ने बाद में अपनी ही बात से
यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया था कि उन्होंने तो यह बात आवेग में आकर कह
दी थी।
उसी समय जर्मनी में तत्कालीन वित्त मंत्री ने अपने ज्ञान को बघारते हुए
कहा था कि मेरे जैसे विद्वान आदमी के बिना भारत आगे नहीं बढ़ सकता।
उन्होंने नरेंद्र मोदी की अर्थव्यवस्था संबंधी ज्ञान को तुच्छ और नगण्य
बताते हुए कहा था कि उनका ज्ञान तो  डाक टिकट के पिछले हिस्से पर लिखा जा
सकता है। इसी लाइन को आगे बढ़ाते हुए कभी-कभार बोलने वाले तत्कालीन
प्रधानमंत्री ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री
बनना देश के लिए 'विनाशकारीÓ साबित होगा।  खैर विधि को जो मंजूर था वही
हुआ। देश ने पिछले साठ वर्ष की राजनीतिक प्रक्रिया और विमर्श को सिर के
बल खड़ा कर दिया और भाजपा को अप्रत्याशित बहुमत दिया।
नई सरकार बनने के बाद कई दशकों से सत्ता की नजदीकी का सुख भोग रहे
बुद्धिजीवी और साहित्यकार बेरोजगार हो गए। उनके पास अब एक ही काम बचा था
और वह था बात-बात पर सरकार को प्रमाणपत्र देना। जाहिर है सबसे अधिक
प्रमाणपत्र पंथनिरपेक्षता के नाम पर बांटे जा सकते थे, लेकिन नई सरकार
जिस तरह 'सबके साथ और सबके विकास का बातÓ कर रही थी, उसने प्रमाणपत्र
जारी करने की संभावनाओं को बहुत क्षीण कर दिया था और पंथनिरपेक्षता की
दुहाई देने वाल खुद को बहुत दिक्कत में पा रहे थे।
सरकार के गठन के बाद जमीन पर तो सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, लेकिन कुछ
निश्चित खेमों में व्यग्रता दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी। इन खेमों के
खांचे और निष्कर्ष दोनों, पूर्वनिर्धारित थे। घटना कोई भी हो, किसी भी
कारण घटी हो, उसकी व्याख्या निर्धारित खांचे में की जानी थी  और पहले से
तय निष्कर्षों की हर बार पुष्टि करना होता था। खांचा पंथरिपेक्षता का था
और निष्कर्ष पंथनिरपेक्षता बढ़ता हुआ खतरा।  चूंकि परंपरागत खाचें में
सरकार को कोसा नहीं जा पा रहा था, इसलिए उसमे नए पैमाने और तत्त्वों का
समावेश किया गया। लक्ष्य केवल इतना था कि देखो जी! हमने जैसा कहा था,
वैसा ही हो रह है। भारत की 'गंगा-जमुनी तहजीबÓ तार-तार हो रही है और
सांप्रदायिक सौहार्द हवा होता जा रहा है।
नई सरकार के बने बमुश्किल दो महीने भी नहीं हुए थे कि आउटलुक अंग्रेजी ने
अपनी कवर स्टोरी इस बात को बनायी की देश में कट्टरता बढ़ रही है। जबकि उस
समय ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिससे इस तरह की बहस की शुरुआत भी हो सके।
मंत्रिमंडल की संरचना और कुछ फुटकर बयानों के जरिए यह साबित करने की
कोशिश की गई की यहां पर पंथनिरपेक्षता धरातल में पहुंचने वाली है। इसी
पत्रिका ने चुनावों के समय नरेंद्र मोदी के चेहरे की मैपिंग करवाई थी और
यह साबित करने की थी कि नरेंद्र मोदी देश की पंथनिरपेक्षता के लिए घातक
साबित होंगे।
 हद तो तब हो गई भारतीय भाषाओ के प्रति सरकार द्वारा संजीदगी दिखाए जाने
के प्रकरण को बढ़ती तानाशाही के रूप में पेश किया गया और ऐशा बताया जाने
लगा कि इससे देश की एकता और विकास दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।  गौरतलब है
कि उस समय संघ लोक सेवा आयोग में भारतीय भाषाओं के प्रति हो रहे अन्याय
को लेकर देश आंदोलित था।
इसके बाद शुरू हुआ चर्च पर हमले और नन बलात्कार का प्रकरण। यहां से लेकर
अमरीका तक हो-हल्ला मचाया गया कि नई सरकार बनने के बाद से चर्चों पर हमले
बढ़ गए है और पश्चिम बंगाल में एक नन के बलात्कार के बाद तो आसमान ही सिर
पर उठा लिया गया। बिना सबूत, बिना अदालत सरकार और संघ परिवार को पानी
पी-पीकर कोसा जाने लगा। बाद में पता चला कि जिसे चर्चों पर हिंदू
कट्टरपंथियों के हमले के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया
गया, वह चोरी की मामूली घटनाएं थी और नन के बलात्कार का आरोपी एक
बांग्लादेशी मुस्लिम निकला। लेकिन कई लोग इस प्रकरण को लेकर अमरीका से
सहायता तक मांगने पहुंच गए थे और दुनिया भर में यह ढिंढोरा पीटा की नई
सरकार भारत में गैर हिंदुओं के साथ अन्याय ढा रही है।
प्रमाणपत्र देने की इसी कड़ी और आगे बढ़ाया अमत्र्य सेन ने। नालंदा
विश्वविद्यालय में सरकार उनको दूसरा अवसर देने के पक्ष में नहीं थी। इससे
दु:खी होकर उन्होंने यह राग अलापा भारत की नई सरकार विद्वानों का सम्मान
नहीं कर रही है और बहुत ही औसत दर्जे के लोगों को आगे बढ़ा रही है। वैसे
दूसरों को बौद्धिक दृष्टि से हेय समझना वामपंथी विचारधारा की नैसर्गिक
प्रवृत्ति है। खुद कुछ करें या न करें,दूसरों को बौद्धिक दृष्टि से खोखला
जरूर बताते रहते हैं। अमत्र्य सेन अपनी इस व्यथा को प्रकट करने में भी
पंथनिरपेक्षता का फुटनोट की तरह उपयोग करते रहते थे ताकि उनकी निष्ठा और
बौद्धिकता पर संदेह न किया जा सके।
इस नवीन और पाखंडी पंथनिरपेक्षता के अभियान का सबसे ताजा संस्करण
साहित्यकारों द्वारा बढ़ती असहिष्णुता के नाम पर साहित्य अकादमी पुरस्कार
का लौटाया जाना है।
इसकी शुरुआत लेखक और कवि उदय प्रकाश द्वारा कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की
हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए जाने से होती है। उदय
प्रकाश का कहना था कि भारत में अभिव्यक्ति का स्पेस संकुचित हो रहा है।
इस संकुचन के विरोध स्वरूप उन्होंने अपना पुरस्कार वापस कर दिया। गौरतलब
है कि पिछले कुछ सालों से उदयप्रकाश को प्रगतिशील साहित्यिक बिरादरी ने
अपनी जमात से बहिष्कृत कर रखा था। उन पर यह आरोप था कि उन्होंने योगी
आदित्यनाथ से सम्मान ग्रहण कर प्रगतिशीलता के सिद्धांत की धज्जियां उड़ाई
है। भगवाधरी व्यक्ति से पुरस्कार ग्रहण करने के बाद कोई प्रगतिशील कैसे
रह सकता है? संभवत: उदयप्रकाश अपनी प्रगतिशीलता के दामन पर लगे दोगों को
दूर करने तथा सुरक्षित 'घर वापसीÓ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार को
औजार बना रहे थे और इसमें वह कुछ हद तक सफल भी रहे। इस कदम के कारण उनको
'शहादती दर्जाÓ प्राप्त हो गया।
नयनतारा सहगल के साहित्यिक अवदान के बारे में लोगों को कम ही पता था।
इसीलिए उन्होंने जब पुरस्कार लौटाने की घोषणा की तो उनके पक्ष की लॉबी ने
भी उनका परिचय एक साहित्यकार से अधिक जवाहरलाल नेहरू की भांजी के रूप में
कराया। मानो जवाहरलाल नेहरू के सगे-संबंधियों द्वारा यदि पंथनिरपेक्षता
के बारे में कुछ कह दिया जाए तो वह अंतिम प्रमाण हो, उसके बाद कुछ कहने
सुनने के लिए बचता ही नहींै। वह अखलोक की हत्या से दु:खी थी, लेकिन इसके
लिए उन्होंने राज्य सरकार के बजाय मोदी सरकार को निशाने पर लिया। हो सकता
है वह भावना में बह गई होंं और इस कारण तथ्य को भूल गई हों कि कानून
व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है। यहां यह याद दिलाना
प्रासंगिक होगा कि नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार 1984 मे
दिल्ली में मचे कत्लेआम के आस-पास ही स्वीकार किया था।
अशोक वाजपेयी साहब की तो छवि ही साहित्यकार से अधिक साहित्यिक प्रबंंधक
की रही है। वह साहित्यकार की मुद्रा में व्यवस्था पर टिप्पणी देते हैं।
साहित्यिक संास्कृतिक संस्थानों में होने वाली नियुक्तियों पर उनकी पैनी
नजर रहती है। उनके स्तंभ को पढऩे पर यह पता चलता है कि समय-समय पर वह
अधिकारी भाव से यह प्रमाणपत्र देते रहते हैं कि अमुक नियुक्ति सही है
अथवा अमुक नियुक्ति गलत। जाहिर है उनके साहित्य पर उनका प्रशासक हावी
रहता है।  उनकी चिंंता भी पंथनिरपेक्षता ही है लेकिन इन्हीं साहब का दिल
भापाल गैस कांड,जिसमें हजारों लोग मारे गए थे, के खिलाफ नहीं पसीजा था।
इसके बाद तो पुरस्कार लौटाने की भेड़चाल शुरू हो गई।
यहां पर यह बात याद रखनी जरूरी है कि जिस साहित्यिक   बिरादरी से संबंधित
लोग पुरस्कारों को वापस कर रहे हैं, प्रारंभ से उनका विश्वास साहित्य
सर्जना से अधिक प्रमाणपत्र देने में रहा है। वामपंथी विचारधारा साहित्य
सृजन कम किया है और आलोचना अधिक। इस आलोचना में भी विवेचन कम, बुरा -भला
साबित करने की प्रवृत्ति अधिक रहती है। सभी वामपंथी आलोचना को ही अपना
केंद्रीय विषय बनाते हैं और इसे ही अपने साहित्यिक अवदान के रूप में
परिभाषित करते हैं। इस आलोचना ने पिछले चालीस सालों में साहित्यिक
मठाधीशी को जन्म दिया है। कुछ न करके भी, किसी के खिलाफ फतवा जारी करने
की प्रवृति वामपंथी साहित्य मंडली के रग-रग में बस चुकी है। इसके कारण
हिंदी ही सरसता को ठेस तो लगी ही है, उसकी विषयवस्तु भी भारत नहीं, रूस,
फ्रांस, चीन और क्यूबा बन गए हैं। नए और स्वतंत्र चेता साहित्यकारों  के
लिए यहां पर कोई स्पेस नहीं था। अज्ञेय जैसे महान साहित्यकारों को भी
उनके अंतिम पड़ाव पर भारतीय दर्शन की तरफ झुकाव के कारण इस मंडली ने
लानत-मलानत की थी।
 खैर, पहले इन साहित्यिक फतवों का सत्ता प्रतिष्ठान पर असर होता था,
लेकिन अब इनकी कोई पूछ नहीं है। सारी छटपटाहट का कारण भी यही है। इन
साहित्यिक मठाधीशों से पूछे बगैर ही साहित्यिक रीति-नीति तय की जा रही
है।  इसलिए धर्म को राजनीति से दूर रखने की पैरोकारी करने वाली मंडली अब
साहित्य और राजनीति के घालमेल को पंथनिरपेक्षता की कसौटी बता रही है और
इस तरह पंथनिरपेक्षता को और भी अधिक पाखंडी बना रहे हैं। इनका दुर्भाग्य
यह है कि देश अब उनके चेहरों को पहचान चुका है और निर्णय मुखौटों के बजाय
वास्तविक चेहरे के आधार पर ले रहा है।