रविवार, 15 मई 2016

शक्ति पूजा का ‘निराला’ पथ


नवरात्र शक्ति के आह्वान का पर्व है। यह शक्ति के अवतरण के लिए आधारभूमि तैयार करने का साधना काल है, इसलिए इसे साधनापर्व भी कहा जाता है। शाक्त सपं्रदाय की मान्यता है कि दैवीय शक्ति विविध, सूक्ष्म रुपों में सदैव ब्रह्मांड में विचरती रहती है लेकिन वह प्रत्यक्ष और भौतिक रुप तभी धारण करती है, जब उसको उचित आधार मिलता है। उसका अवतरण उचित पात्र में संभव हो पाता है। आधार पुष्ट हो, शक्ति के तेज को वहन करने योग्य हो, तो शक्ति का अवतरण स्वयं घटित हो जाता है। इसलिए, नवरात्रों में स्वयं को साधने की कोशिश की जाती है, स्वयं को एक मजबूत आधार, उचित पात्र में रुपांतरित करने की कोशिश होती है।
व्रत, उपवास, जप, अखंड दीप, संयमित जीवनशैली शक्ति के तेज को धारण करने की तैयारी ही तो हैं। नौ दिनों तक ब्रह्मांडीय शक्तियों का आह्वान और पिंडीय (शरीरगत) शक्तियों का स्मरण यही तो नवरात्र है। यहां पर यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि शक्ति का साधना का मतलब अप्राप्य शक्तियों की प्राप्ति भर नहीं है बल्कि यह प्राप्त शक्तियों के सतत स्मरण और उन पर विश्वास बनाए रखने की भी साधना है। ‘अहं ब्रह्मास्मि‘ के स्वरुप को सतत याद रखने मात्र से हम विराट शक्तिपुंज से जुड़ जाते हैं। इस स्वरुप के स्मरण मात्र से हमारा कर्मक्षेत्र और लक्ष्य दोनांे विस्तृत हो जाते हैं। इसी तरह ‘का चुप साधि रहा बलवाना‘ के जरिए भी जांबवान ने हनुमान को उनके ‘अतुलित बलधामं‘ के स्वरुप से परिचित कराने की कोशिश भर की है। उसके बाद शक्ति का विस्फोट कैसे होता है और वह कौन-कौन अविश्वसनीय काम करा लेती है, यह बताने की जरुरत नहीं है।
यहां पर प्रश्न यह उठता है कि क्या शक्ति जागरण अथवा शक्ति अवतरण केवल वाह्य उपकरणों तक सीमित है। क्या वाह्य पदार्थों के अर्पण तक ही शक्ति साधना सीमित है और क्या अंतःकरणीय रुपांतरण, शक्ति का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आवश्यक नहीं है? शक्ति जागरण में वाह्य विधि-विधान और अंतःकरणीय रुपांतरण संबंधों को लेकर भारतीय मनीषियों में चिंतन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है, लेकिन इस पर बहुत मौलिक और सामयिक चिंतन हमें निराला की कविता राम की शक्तिपूजा में मिलता है। आज जब शक्तिपूजा को लेकर विभ्रम की स्थिति पैदा हो गई है अथवा की जा रही है, तो निराला की शक्तिपूजा हमें शक्ति और उसकी पूजा के सत्व से परिचित करा सकती है।
स्थूल दृष्टि से देखें तो यह कविता राम-रावण युद्ध के दौरान विजय प्राप्त विजय प्राप्त करने के लिए भगवान राम द्वारा की गई शक्ति उपासना का एक विशद, काव्यमय वर्णन मात्र है। लेकिन यदि गहराई में उतरें तो यह पाते हैं कि इस कविता शक्ति की गरिमा का बखान तो है ही , उसके साथ ही शक्ति साधना का सूक्ष्म और तात्विक विवेचन भी है, जिसके जरिए शक्ति-अवतरण के वास्तविक सूत्रों की पहचान की जा सकती है।
यह महाकविता शक्ति की प्रकृति, गति और महत्ता को बहुत सूक्ष्मता से संबोधित करती है। शक्ति की सबसे अधिक आवश्यकता संक्रमणकाल में होती है। परिवर्तन के समय, यु़द्ध के समय, प्रत्येक व्यक्ति शक्ति का आकांक्षी हो जाता है। संक्रमण और परिवर्तन के दौर में जिसके पास शक्ति का बाहुल्य होता है वह मूल्यों को नई व्यवस्था को अपने ढंग से गढ़ता है। संभवतः यही कारण है कि शक्ति आराधना का पर्व ऐसे समय पर पड़ता है जब समय करवट ले रहा होता है। संक्रमणों से आदमी त्र्ास्त होता है। ऐसे में शक्ति साधना का आध्यात्मिक महत्व तो होता ही है, उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी महत्व कम नहीं होता।  
‘ राम की शक्ति पूजा ’ भी राम-रावण युद्व के एक बिंदु से प्रारंभ होती है, जहां पर युद्ध निर्णायक स्थिति में पहुंच चुका होता है। उस दिन विशेष का युद्ध थोड़ा रावण के पक्ष में झुका हुआ होता है। राम व्यथित और हताश है। कविता स्थिति का जीवंत वर्णन करते हुए कहती है-
लौटे-युग-दल-राक्षस -पतदल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरण चिन्ह,चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।
प्रशमित है वातावरण , नमित मुख सांध्यकमल,लक्ष्मण चिंतापल पीछे वानर वीर-सकल।
स्थितियां बहुत निराशाभरी हैं। विश्वविजय की क्षमता रखने वाले भगवान राम अपनी क्षमताओं को बिसरा चुके हैं। पहली बार उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि युद्ध हाथ से निकल चुका है। इस मनःस्थिति और परिस्थिति का वर्णन कवि बहुत सजीव ढंग से करता है-
है अमानिशा, उगलता गगन घन अंधकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण जय-भय।
कारण बहुत स्पष्ट था। राम आज युद्ध भूमि में हतलक्ष्य हो गए थे। विश्वविजय की क्षमता रखने वाले और क्षात्रधर्म की प्रतिष्ठा रखने वाले उनके तमाम शस्त्र विफल हो गए थे। रावण को लक्ष्य करके वह जिस भी शक्ति का संधान कर रहे थे, वह निष्फल हो जा रही थी। महाशक्ति ने आज रावण को अपने आंचल की छांव दे रखी थी और वह राम के युद्ध विजय के प्रयासों से क्रोधित हो रही थी। शक्ति के इस रुप को देखकर, उसे रावण के पक्ष में देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम स्वयं को हतबल पा रहे थे- 
देखा है महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक
हत मंत्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार, निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र बार-बार
विचलित लख कपिदल क्रुद्ध,युद्ध को मै ज्यो-ज्योंझक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यो-त्यों
पश्चात, देखने लगी बंध गए हस्त, फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बंधा मैं, हुआ त्रस्त।
शक्ति को अन्याय के पक्ष देखकर श्री राम को घोर आश्चर्य हुआ। वह शिकायत भरे शब्दों में कहते हैं-‘ अन्याय जिधर, है उधर शक्ति ’। मर्यादा पुरुषोत्तम की यह क्षोभ हर धार्मिक व्यक्ति का क्षोभ है। हम भी जब देखते हैं कि अन्याय के पक्ष में संसाधन हैं, शक्ति है, ऐश्वर्य है, पद -प्रतिष्ठा है तो हमारी मनोव्यथा भी रघुवर जैसी ही होती है। अन्याय के पक्ष में शक्ति होने की विडंबन हम सब को व्यथित करती है। कई बार इसे नियति भी मान लिया जाता है। ऐसी स्थिति में हम यह भूल जाते हैं कि शक्ति भी कुछ नियमों से संचालित होती है। ऐसे पड़ावों पर शक्ति की प्रकृति और उसकी गति को दरकिनार कर दिया जात़ा है। महाप्राण निराला जाम्बवान के माध्यम से शक्ति की उसी प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं-
हे पुरुष सिंह, तुम भी शक्ति को करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर
तुम बरो विजय संयत प्राणों को प्राणों पर, रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय ही सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन
छोड़ दो समर जब तक न सिद्ध हो, रघुनंदन!
जाम्बवान का यह कथन शक्ति को संचालित करने वाले कई सिद्धांतों का अनावरण करती है। पहला यह कि शक्ति का अर्जन प्रयासों के तत्र से जुड़ा है। जो भी प्रयास करता है, शक्ति के द्वार पर प्रयासों के माध्यम से दस्तक देता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता। रावण खल है लेकिन पुरुषार्थी भी है, इसलिए शक्ति उसके पक्ष में खड़ी हुई दिखाई पड़ती है। जब हम अच्छे-बुरे का विभाजन कर, शक्ति को बुराई के पक्ष में खड़ा करने की धृष्टता कर रहे होते हैं तो पुरुषार्थ की महिमा और प्रक्रिया के महत्व को भी नकार रहे होते हैं। 
हो सकता है और प्रायः होता ही है कि खल पक्ष सापेक्षिक दृष्टि से अधिक पुरुषार्थी होता है, ज्यादा प्रयत्नशील होता है और शक्ति अर्जन की प्रक्रियाओं के बारे में अधिक सजग भी होता है। दूसरी तरफ सद्पक्ष पुरुषार्थ के जरिए शक्ति को प्राप्त करने, घटित हो रही घटनाओं के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और हस्तक्षेप करने की बजाय, बाहर खड़ा अच्छाई के लिए रुदन कर रहा होता है जिसकी अंतिम परिणति एक ऐसे दृष्टिकोण के रुप में आकार लेती है जो मानता है कि शक्ति असत्य के पक्ष में ही खड़ा होता है। लेकिन पुरुषोत्तम तो परम पुरुषार्थी हैं, मूर्तिमान धर्म हैं। इसलिए जांबवान उनको समझाते हुए कहते हैं कि आप तो शक्ति धारण करने के स्वाभाविक अधिकारी हैं। जांबवान यहां पर इसी तथ्य की ओर संकेत कर रहे हैं कि कुछ नियमों से संचालित होने के कारण शक्ति ऐसे किसी भी व्यक्ति पर अनुग्रह करती है जो उन नियमों के अनुसार उनकी उपासना कर रहा होता है। लेकिन शक्ति का प्रियपक्ष तो सद्पक्ष ही होता है। शक्ति के मंगलकारी आयाम की अभिव्यक्ति और दीर्घकालीन उपस्थिति तो धर्मपक्ष में ही होती है।
यहां पर जांबवान के माध्यम से निराला यह भी संकेत कर रहे हैं कि शक्ति का मौलिकता से बहुत गहरा संबंध होता है। मौलिकता एक कष्टकर प्रक्रिया है। यह खुद को सदैव सत्य की खराद पर चढ़ाए रखने से ही पैदा होती है। मौलिकता वस्तुतः स्वयं को सत्य के वृहदतर और सामयिक आयामों से जोड़ने से पैदा होती है। जब तक स्वयं के सत्य को ब्रह्मांड के सत्य से नहीं जोड़ा जाता, तब तक ब्रह्मांडीय शक्ति हममें अवतरित नहीं होती। चूंकि हर व्यक्ति और उसकी स्थितियां अद्वितीय होती हैं, इसलिए मौलिकता स्वयं को सत्य से जोड़ने की मूलशर्त बन जाती है। इसलिए जांबवान मौलिक तरीके से शक्ति की आराधना की बात कर रहे हैं।
एक और रोचक तथ्य यह है कि जांबवान राम को एक ऐेसे समय युद्ध छोड़ने की सलाह दे रहे हैं , जब युद्ध निहायत ही निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। रघुवर के बिना सेना संचालन और युद्ध में जीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन राम इस सुझाव को स्वीकार कर लेते हैं और यही असंदिग्ध निष्ठा ही उन्हें शक्ति के समीप ले जाती है।
अब मर्यादा पुरुषोत्तम शक्तिपूजा को उद्यत होते हैं। सिंह को देवी का प्रतीक मानकर ‘सिंहभाव‘ से देवी की उपासना का निर्णय करते हैं।
जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्जित, यह मेरा परम प्रतीक मातः समझा इंगित,
मैं सिंह, इसी भाव से करूंगा अभिनिंदित।
शक्ति का सिंहभाव से संबंध समझने जैसा है। शक्ति सिंहारुढ़ है। सिंह की सवारी करती है और सिंहभाव मंे निवास करती है। शेर की सवारी बहुत ही दुष्कर और खतरे से भरा कार्य है। जो शेर की सवारी करने जैसा दुष्कर कार्य कर सकते हैं, असंभव माने जाने वाले लक्ष्यों के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है, वही सिंह पर सवारी कर सकता है। शेर पराक्रमी है, चतुर है, फुर्तीला है, जो इन गुणों से युक्त है, माता उस पर सवारी करती हैं। पराक्रम भाव के बिना शक्ति का आशीर्वाद नहीं मिलता। यदि व्यक्ति में सिंहभाव है, वह शत्रु को क्षत-विक्षत करने में हिचकता नहीं, आज के शब्दों में उसके भीतर किलिंग इंस्टिंक्ट है, कालज्ञ है, उचित समय पर वार करता है, तो माता उस व्यक्ति पर सवारी करती हैं उसके भीतर अवतरित होती हैं।
इसके बाद श्रीराम प्रकृति के अंग-उपांगों में देवी की उपस्थिति की अनुभूति करते हैं। उनके लिए समुद्र से लेकर अंबर तक सब कुछ शक्ति का स्वरुप हो जाता है। वह देवी जप के पुरश्चरण के लिए 108 कमल पुष्पों की मांग करते हैं। उनके लिए कमल के पुष्प प्रकृति में उपलब्ध अर्पण करने योग्य सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। राम कहते हैं-
देखो बंधुवर, सामने,स्थिर जो वह भूधर, शोभित शत -हरित गुल्म-तृण से श्यामल सुंदर,
पार्वती कल्पना है, इसकी मकरंद विंदु , गरजता चरण प्रांत पर हिस वह, नहीं सिंधु।
दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर, अंबर में हुए दिगंबर अर्चित शशि-शेखर
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चहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इंदीवर ,कम से कम, अधिक और हों, अधिक और सुंदर 
जओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर, तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।
साधना प्रतिदिन गहन होती जाती है। श्रीराम की कुंडलिनी शक्ति जागृत होना प्रारंभ होती है। उनके आराधना के प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि कंपायमान हो जाती है।  लेकिन ज्यों ही शक्ति सहस्रार चक्र को बेधने वाली होती है, और श्रीराम 108 वां कमलपुष्प देवी को अर्पित कर आराधना का समापन करने का उ़द्यत होते हैं, देवी उनकी परीक्षा लेने के लिए, उनके पीछे रखे 108 वें पुष्प को हंसकर उठा ले जाती हैं। श्रीराम नीलकमल का अंतिम पुष्प अर्पित करने के लिए हाथ बढ़ाते हैं और वहां पर कुछ न पाकर साधना में स्थिर हो चुका उनका मन यकायक चलायमान हो उठता है। आशंकाएं उनको घेरने लगती हैं। वह अपने जीवन का घिक्कारते हैं -धिक धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध। लेकिन राम तो मर्यादा के लिए सतत संघर्ष के प्रतीक हैं। वह तुरंत ही स्वयं को संभालते हैं और 108 वें नीलकमल की जगह अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करने का निर्णय लेते हैं। इस निश्चय के साथ ही उनकी शक्ति आराधना अपने शीर्षतम बिंदु को स्पर्ष करती है और उनके व्यक्तित्व को उज्जवलतम पक्ष भी हमारे सामने आता है-
‘यह है उपाय’ कह उठे राम ज्यों मंद्रित घन,क्हती थीं, माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल है शेष अभी , यह पुरश्चरण, पूरा करता हूं देकर मातः एक नयन।
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर, रहा झलक, ले लिया हस्त, लक-दक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन, ले अर्पित करने को उद्यत हो गए सुमन
जिस क्षण बंध गया बेधने को दृढ निश्चय, कांपा ब्रह्मांड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
साधु-साधु साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम! क्ह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
नील कमल के गायब होते ही मर्यादापुरुषोत्तम को स्मरण हो आता है बचपन मे उनकी माता, उनके सुंदर और विशाल नेत्रों के कारण उन्हें कमलनयन के नाम पुकारती थीं। अब उन्होंने कमल के पुष्प की जगह पर अपनी कमल जैसी आंखे भगवती को अर्पित करने का निर्णय लिया, अपने शरीर के इस सर्वाधिक सुंदर अंग को देवी को अर्पित करने का निश्चय किया। वह ज्योंहि ही बाण से अपनी दाहिनी आंख को भगवती को समर्पित करने का प्रयास करते हैं, भगवती स्वयं प्रकट होकर उनके हाथ को पकड़ लेती हैं। वह उनके धर्म की प्रति निष्ठा की प्रशंसा करती हैं। 
यहां पर निराला का मन्तव्य स्पष्ट है कि साधना व्यक्तित्व के सर्वश्रेष्ठ अंश का समर्पण मांगती हैं। भगवती आसक्तियों और आकांक्षाओं का बलिदान मांगती हैं। यदि व्यक्ति अपनी प्रतिभा, क्षमता, उत्कृष्टता का समर्पण देवी के चरणों में करता है तो उसे वह वरदान मिलता ही है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम को मिला-
होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन, कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन

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